11.13.07
..कौन कहता है ¨रदों को खुदा याद नहीं’
कोटा. गजल सम्राट गुलाम अली का जादू उनके प्रशंसकों के सिर चढ़कर बोलने लगा है। 26 बरस पहले कोटा आए गुलाम अली को सुन चुके उनके प्रशंसकों ने उस
जमाने की यादों को सहेजना भी शुरू कर दिया है। उनके प्रशंसक कहते हैं कि गुलाम अली को कोटा लाने में प्रसिद्ध कव्वाल युसूफ अली माध्यम बने थे।
गुलाम अली के प्रशंसक तरूमीत सिंह बेदी बताते हैं कि वह 18 जनवरी 1981 की सर्द रात थी, जिसे गुलाम अली की आवाज ने एक यादगार रात बना दिया। बेदी कहते हैं कि गुलाम अली ऐसे गायक हैं जिन्हें कानों से नहीं दिल से सुना जाता है। गुलाम अली के प्रशंसकों में शामिल तत्कालीन विद्युत मंडल में मुख्य अभियंता बीएस झा, डीसीएम के सीएमडी एन सी ब्रrा, जगजीत सिंह बेदी, पारस झांझरी, के एल जोहरी समेत बड़ी संख्या में शहर के प्रबुद्ध नागरिक यहां मौजूद थे।
छोटी बहर की गजल गाने के लिए विख्यात गुलाम अली ने कुछ इस तरह शुरुआत की ‘जाम जब पीता हूं, मुंह से कहता हूं बिस्मिल्लाह, कौन कहता है रिंदों को खुदा याद नहीं’ इसके बाद शुरू हुआ फरमाइशों का दौर जो पूरी रात जारी रह। एक से बढ़कर एक गजल पर श्रोता झूमते रहे। श्रीराम कलामंदिर का परिसर तालियों से गूंज उठा जब फरमाइश पर उन्होंने सुनाया कि ‘कौन समझाए कि क्या रंग है मयखाने का, आंख साकी की उठे नाम हो पैमाने का’। ऐसी ही गजलों को सुनने का एक बार फिर मौका मिलेगा श्रोताओं को 28 अक्टूबर को।
दशहरा मैदान स्थित विजयश्री रंगमंच पर गुलाम अली की गजल संध्या के कार्यक्रम को लेकर व्यापक उत्साह का माहौल है।
प्रोफाइल
* पाकिस्तान के स्यालकोट केलके में 1940 में गुलाम अली का जन्म हुआ।
* पिता गजल गायक व सारंगी वादक थे।गुलाम अली ने 15 बरस की उम्र में गायन सीखना शुरू किया।
* बड़े गुलाम अली से प्रभावित उनके पिता ने नाम ही गुलाम रख दिया।
* 1960 में सबसे पहले लाहौर रेडियो स्टेशन से गजल गायकी की शुरुआत।