अक्टूबर 13, 2007

गजल की रूह से छेड़छाड़ करना पसंद नहीं : गुलाम अली

Posted in गजल, गुलाम अली, ghazal, ghazal concert, ghazals, Ghulam Ali, jagjit singh, live, live concert at 6:12 पूर्वाह्न द्वारा Amarjeet Singh

गजल की बात चले और गुलाम अली का जिक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। उनके जितने फैन उनकी सरजमीं पाकिस्तान में हैं, उससे कई गुना हिंदुस्तान और दुनिया भर में। आज शाम राजधानी की ऐतिहासिक धरोहर कुतुब मीनार पर गुलाम अली की गजलें फिर गूंजेंगी। नवभारत टाइम्स द्वारा आयोजित गजलों की इस खास शाम में प्रस्तुति देने के लिए खासतौर से दिल्ली आए गजलों की दुनिया के बेताज बादशाह .गुलाम अली से हमारी संवाददाता प्रियंका सिंह और प्रशांत सोनी ने खास मुलाकात की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश :

दिल्ली आपके दिल के कितने करीब है?

दिल्ली तो दिलवालों का शहर है। इसके बारे में जितना कहा जाए, कम है। यहां का खाना, मौसम, अवाम, ऐतिहासिक जगहें, हरियाली, सब कुछ मुझे पसंद है। दिल्ली मेरे भी दिल के उतने ही करीब है, जितनी आपके या किसी और के। यहां परफॉर्म करना मुझे अच्छा लगता है। वैसे दिल्ली कई मायनों में लाहौर से काफी मिलती-जुलती है।

इसी साल मार्च के महीने में पुराने किले में आपकी गजलें गूंजी थी। अब कुतुब मीनार के साये में गाएंगे। हिंदुस्तान की इन ऐतिहासिक धरोहरों के समीप प्रस्तुति देना आपके लिए कितना खास है?

इन जगहों पर प्रस्तुति देना वाकई मेरे लिए बहुत खास है। आगरे का ताजमहल हो या बनारस के घाट, या फिर दिल्ली का पुराना किला और कुतुब मीनार, जब मैं इन जगहों पर गाता हूं, तो मुझे अहसास होता है कि मैं एक ऐसी जगह पर गा रहा हूं, जिसका ऐतिहासिक महत्व है। इन जगहों का पारंपरिक माहौल गजल की पुरानी रवायत के करीब नजर आता है। वैसे मेरी गायकी भी काफी पारंपरिक है।

हिंदुस्तान में परफॉर्म करना आपको कैसा लगता है?

यहां आकर परफॉर्म करना मेरे लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के हर कलाकार के लिए खास महत्व रखता है। यहां सुननेवालों से हर कलाकार को जैसी मुहब्बत और इज्जत मिलती है, वैसी दुनिया में और कहीं नहीं मिलती। यहां के लोगों का प्यार ही है, जो हर बार मुझे यहां खींच लाता है। यहां मेरे हर कार्यक्रम में जिस तरह भीड़ उमड़ती है, उसे देखकर अहसास होता है कि वाकई मैंने यहां के लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई है। यह मेरे लिए बड़े फख्र और खुशी की बात है।

लोग कहते हैं कि जमाना बदला, गजल बदली, लेकिन गुलाम अली नहीं बदले। क्या आप इस बात से सहमत हैं?

सही है कि वक्त के साथ काफी कुछ बदला। चीजें काफी कॉमर्शलाइज्ड हो गई हैं। लोगों के पास अब वक्त भी कम है लेकिन जहां तक मेरी बात है तो मैं मानता हूं कि हर कलाकार की अपनी अलग शैली होती है। यह सच है कि समय के साथ-साथ गजल में कई तरह के बदलाव आए हैं, लेकिन मुझे लगता है कि ट्रडिशनल तरीके से गजल गाना अब मेरी पहचान बन चुकी है। लोग शायद इसीलिए आज भी मुझे और मेरी गायकी को पसंद करते हैं। ऐसा नहीं है कि मैं गजलों में नए प्रयोग करने के खिलाफ हूं, लेकिन प्रयोग के नाम पर गजल की रूह के साथ छेड़छाड़ करना मुझे पसंद नहीं है। मैं कभी अपना क्लासिकल बेस नहीं छोड़ता।

‘ चुपके-चुपके रात दिन…’ .गाल आपकी पहचान बन चुकी है। इस .गाल में ऐसा क्या है कि लोग आज भी इसे उतना ही पसंद करते हैं?

सच कहा आपने। यह गजल मेरी पहचान बन चुकी है, इसीलिए मेरे लिए बहुत खास है। मेरे स्टेज पर पहुंचते ही लोग इस गजल की फरमाइश शुरू कर देते हैं। दरअसल इस गजल के बोल और इसकी कंपोजिशन इतनी खास है कि हर दौर के लोगों को यह पसंद आती है। मैंने सबसे पहले रेडियो पाकिस्तान पर यह गजल गाई थी और जहां तक मेरा ख्याल है, उसके बाद से मेरी ऐसी कोई परफॉर्मेन्स नहीं रही, जब मैंने यह गजल न गाई हो।

हिंदुस्तानी गजल गायकों के बारे में आपकी क्या राय है?

हिंदुस्तानियों के दिलों में भी गजल का उतना ही खास मुकाम है, जितना पाकिस्तानियों के दिलों में है। यही वजह है कि यहां आज भी गजल की रवायत मौजूद है। तलत अजीज, हरिहरन, पंकज उधास और पीनाज मसानी जैसे कई फनकारों ने इसे सजाया, संवारा और संभाला है। जगजीत सिंह का तो इसमें सबसे खास योगदान रहा है। पाकिस्तान में भी लोग उन्हें चाहते हैं।

उभरते गायकों को आप क्या नसीहत देना चाहेंगे?

मैं सिर्फ यही कहूंगा कि ‘सचाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से, खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से।’ कहने का मतलब यह कि जो लोग लगन और मेहनत से संगीत सीख रहे हैं, वे जरूर आगे बढ़ेंगे। उभरते कलाकारों से मैं यही कहना चाहूंगा कि क्लासिकल का बेस न छोड़ें, क्योंकि वही संगीत का आधार है। अगर गजल की बात करें तो उर्दू की अच्छी समझ भी जरूरी है।

पाकिस्तान और हिंदुस्तान के आपसी रिश्तों के बारे में आपकी क्या राय है?

हमें यह समझना चाहिए कि अगर हम आपस में एक हो जाएं, आपसी समझदारी बढ़ाएं तो फिर दुनिया की कोई ताकत हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। मुझे लगता है कि दोनों मुल्कों के बीच आपसी समझदारी बढ़ रही है, रिश्ते सुधर रहें हैं। रमजान का पाक महीना है और मैं अल्लाह ताला से गुजारिश करता हूं कि इन दोनों मुल्कों में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अमन-चैन कायम रहे।

… और रिश्तों को सुधारने में संगीत की भूमिका!

संगीत हमेशा से सीमाओं से परे रहा है। दोनों मुल्कों के कलाकार एक-दूसरे के यहां खुलकर परफॉर्म कर रहे हैं और खासे पसंद भी किए जा रहे हैं। इससे अवाम में भाईचारा बढ़ता है।

टैलंट हंट प्रोग्रामों खासकर एक कार्यक्रम में हिंदुस्तानी व पाकिस्तानी उभरते कलाकारों के बीच मुकाबले को आप किस रूप में देखते हैं?

यह बहुत ही अच्छा है। पाक से गायकों का चयन मैंने ही किया था। हालांकि इस तरह के प्रोग्राम में कई बार वोटिंग के आधार पर कुछ नाकाबिल लोग भी आगे बढ़ जाते हैं। फिर भी दोनों देशों के लोग इन गायकों को सराह रहे हैं, उनका समर्थन कर रहे हैं, यह बहुत ही अच्छी बात है।

फास्ट म्यूजिक के चलन के बीच गजल का क्या भविष्य नजर आता है?

देखिए, फिल्मों में अच्छा काम करने के बावजूद मैंने ज्यादा काम नहीं किया। फिल्मों में गजल के लिए ज्यादा स्कोप नहीं होता। लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता कि संगीत से संजीदगी घट रही है। मुझे सुनने सिर्फ वही लोग आते हैं, जिन्हें वाकई संगीत की समझ होती है। वैसे, जब तक अच्छे गानेवाले हैं और अच्छे सुनने वाले हैं, गजल को कोई नुकसान नहीं है।

दिल्ली की अवाम को आपका क्या संदेश है?

दिल्ली एक बेहद खूबसूरत और ऐतिहासिक शहर है। यहां के बाशिंदों को मेरा संदेश है कि वे इस विरासत से प्यार करें और इसे संजो कर रखें। गर्मजोशी बनाए रखें और अच्छे गायकी को भी अपने दिल में बसाए रखें।

Source: एनबीटी

अक्टूबर 12, 2007

कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता..

Posted in chitra singh, ghazal, ghazals, jagjit, jagjit singh, Nida Fazli, singh, Urdu at 7:11 पूर्वाह्न द्वारा Amarjeet Singh

मुंबई। ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता..कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता’। निदा फाजली की गजलों में जिंदगी की कशमकश को काफी शिद्दत से महसूस किया जा सकता है।
फाजली साहब ने जिंदगी के उतार-चढ़ाव तथा जीवन के सभी पहलुओं को शायद बहुत ही करीब से जिया है। यही वजह है कि उनकी शायरी में जिंदगी की कशिश झलकती है।
12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में जन्मे उर्दू साहित्य जगत के अजीम शायर और गीतकार निदा फाजली को शायरी विरासत में मिली। उनके घर में उर्दू और फारसी के दीवान संग्रह भरे पड़े थे। निदा फाजली के वालिद भी शेरो-शायरी में दिलचस्पी रखते थे और उनका अपना काव्य संग्रह भी था। निदा फाजली अक्सर उनके काव्य संग्रह को पढ़ा करते थे। निदा फाजली ने वर्ष 1954 में स्नातकोत्तर की शिक्षा ग्वालियर कालेज से पूरी की। आजादी के बाद उनका पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया, लेकिन निदा फाजली ने हिंदुस्तान में ही रहने का निर्णय लिया। एक दिन निदा फाजली एक मंदिर से गुजर रहे थे तभी उन्हें सूरदास की एक कविता सुनाई पड़ी। इस कविता के माध्यम से राधा और कृष्ण की जुदाई के प्रसंग को दर्शाया गया था। निदा फाजली इस कविता को सुनकर काफी भावुक हो गए और उन्होंने निर्णय लिया कि वह भी एक कवि के रूप में अपनी पहचान बनाएंगे। निदा फाजली मीर और गालिब की रचनाओं से काफी प्रभावित हुए। उन दिनों उर्दू साहित्य के लेखन की एक सीमा निर्धारित थी। धीरे-धीरे उन्होंने उर्दू साहित्य की बंधी-बंधाई सीमाओं को तोड़ दिया और अपने लेखन का अलग अंदाज बनाया। वर्ष 1964 में अपने सपनों को एक नया रूप देने के लिए वह मुंबई आ गए। मुंबई आने के बाद निदा फाजली को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस बीच उन्होंने धर्मयुग और ब्लिट्ज जैसी पत्रिकाओं में लिखना शुरू कर दिया। अपने लेखन की नई शैली की वजह से निदा फाजली कुछ ही समय में लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब हो गए।
इस दौरान उर्दू साहित्य के कुछ प्रगतिशील लेखकों और कवियों की नजर उन पर पड़ी जो उनकी प्रतिभा से काफी प्रभावित हुए थे। निदा फाजली के अंदर उन्हें एक उभरता हुआ कवि दिखाई दिया और उन्होंने उनको प्रोत्साहित करने एवं हरसंभव सहायता देने की पेशकश की और साथ ही उन्हें मुशायरों के कार्यक्रम में आने का न्योता भी दिया।
इस बीच निदा फाजली मुशायरों में भी हिस्सा लेते रहे जिससे उन्हें पूरे देश भर में शोहरत हासिल होने लगी। सत्तर के दशक में मुंबई में अपने बढ़ते खर्चो को देखकर उन्होंने फिल्मों के लिए भी गीत लिखना शुरू कर दिया। लेकिन फिल्मों की विफलता के बाद निदा फाजली को अपना फिल्मी कैरियर डूबता नजर आया, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपना संघर्ष जारी रखा। धीरे-धीरे मुंबई में उनकी पहचान बनती गई। लगभग दस वर्षो तक मायानगरी मुंबई में संघर्ष करने के बाद वर्ष 1980 मे प्रदर्शित फिल्म ‘आप तो ऐसे ना थे’ में अपने गीत ‘तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है ..’ की सफलता के बाद निदा फाजली कुछ हद तक बतौर गीतकार फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। इस फिल्म की सफलता के बाद निदा फाजली को कई फिल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गए। इन फिल्मों में बीबी ओ बीबी, आहिस्ता आहिस्ता, नजराना प्यार का, जैसी फिल्में शामिल हैं। इस बीच उन्होंने कई छोटे बजट की फिल्में भी की।
संगीतकार खय्याम के संगीत निर्देशन में उन्होंने फिल्म आहिस्ता आहिस्ता के लिए ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नही मिलता..’ गीत लिखा। आशा भोंसले और भूपिंदर सिंह की आवाज में अपने इस गीत सफलता के बाद निदा फाजली ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
इस गीत ने पूरे भारत में धूम मचा दी। इसके बाद निदा फाजली ने सफलता की नई बुलंदियों को छुआ और एक से बढ़कर एक गीत लिखे।
वर्ष 1983 निदा फाजली के सिने कैरियर का अहम पड़ाव साबित हुआ। फिल्म रजिया सुल्तान के निर्माण के दौरान गीतकार निसार अख्तर की आकस्मिक मृत्यु के बाद निर्माता कमाल अमरोही ने निदा फाजली से फिल्म के बाकी गीत को लिखने की पेशकश की। गजल सम्राट जगजीत सिंह ने निदा फाजली के लिए कई गीत गाए, जिनमें वर्ष 1999 मे प्रदर्शित फिल्म ‘सरफरोश’ का यह गीत ‘होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है .’ इन दोनों फनकारों की जोड़ी की बेहतरीन मिसाल है। निदा फाजली के काव्य संग्रहों में मोर नाचे, हमकदम और सफर में धूप होगी प्रमुख है।
वर्ष 1998 मे साहित्य जगत मे निदा फाजली के बहुमूल्य योगदान को देखते हुए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा निदा फाजली को खुसरो अवार्ड, महाराष्ट्र उर्दू अकादमी पुरस्कार, हिंदी उर्दू संगम पुरस्कार, मीर तकवी मीर पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
अब तक निदा फाजली द्वारा लिखी 24 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। अपने जीवन के लगभग 69 वसंत देख चुके निदा फाजली आज भी पूरे जोशो-खरोश के साथ साहित्य और फिल्म जगत को सुशोभित कर रहे है।

जगजीत सिंह की हालत स्थिर

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मुंबई। गजल गायक जगजीत सिंह की हालत स्थिर बनी हुई है और उन्हे लकवा हमले की कोई शिकायत नहीं है। यहां बॉम्बे अस्पताल के डॉक्टरों ने मंगलवार को एक टीवी समाचार चैनल पर दिखाई गई खबर को खारिज करते हुए यह बात कही। डॉक्टरों ने कहा कि सिर में दर्द और कमजोरी की शिकायत पर उन्हे अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
बॉम्बे अस्पताल के प्रवक्ता आशीष तिवारी ने बातचीत में कहा कि सिंह को सोमवार को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उन्हे गहन चिकित्सा कक्ष में रखा गया, जहां डॉक्टरों ने उनका परीक्षण किया और कुछ टेस्ट कराए गए। उन पर लकवा के हमले का कोई लक्षण नहीं मिला है। तिवारी ने कहा कि 66 वर्षीय गजल गायक को उनकी पत्नीे सोमवार को अस्पताल लेकर आई। उन्हे कमजोरी और सिर में दर्द की शिकायत थी। तिवारी के मुताबिक जगजीत सिंह की हालत स्थिर बनी हुई है और उन्हे मंगलवार को निजी वार्ड में स्थानांतरित कर दिया गया। सिंह जिन्हे देश के शीर्ष गजल गायकों में से एक के रूप में पहचान मिली हुई है, ने 24 सितंबर को अपना हालिया एलबम ‘करूण’ को यहां के इस्कॉन मंदिर में लांच किया था।
निजी एलबम बनाने के अलावा जगजीत सिंह ने कई फिल्मों के लिए गजल भी गाए भी है। उनकी कुछ यादगार गजलें है- ‘हाथों से छू लू तुम, मेरा गीत अमर कर दो’, ‘झुकी-झुकी सी नजर’, ‘तुमको देखा तो’, और ‘तुम इतना जो मुस्करा रहे हो’ है। जगजीत सिंह ने अपनी पत्नी चित्रा के साथ मिलकर देश में गजल गायन की परंपरा को एक नया अंदाज दिया है। लेकिन चित्रा ने अपने बेटे विवेक की एक दर्दनाक कार हादसे में मौत के बाद गजल गाना छोड़ दिया था।

अक्टूबर 9, 2007

गजल गायक जगजीत सिंह अस्पताल में भर्ती

Posted in जगजीत सिंह, Bombay Hospital, chitra singh, ghazal, ghazals, jagjit, jagjit singh, singh at 1:39 अपराह्न द्वारा Amarjeet Singh

मुम्बई (भाषा), सोमवार, 8 अक्टूबर 2007 ( 23:13 IST )
मशहूर गजल गायक जगजीत सिंह को मस्तिष्क में रक्त के अपर्याप्त संचार के बाद आज यहाँ बम्बई अस्पताल में भर्ती कराया गया।

66 वर्षीय जगजीत अपनी पत्नी चित्रा सिंह के साथ आज सुबह दक्षिणी मुम्बई स्थित इस अस्पताल में आए। उन्हें कमजोरी की शिकायत थी और संस्थान के न्यूरोसर्जन ेकेकी तुरेल ने उनकी जांच की।

तुरेल ने बताया कि सिंह मस्तिष्क में रक्त के अपर्याप्त संचार से जूझ रहे हैं और वक्त रहते मिले इलाज से मस्तिष्काघात टाल दिया गया।
उन्होंने बताया सिंह मेरे पुराने मरीज हैं और छह महीने पहले भी इसी तरह के हालात बने थे।