अक्टूबर 12, 2007

कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता..

Posted in chitra singh, ghazal, ghazals, jagjit, jagjit singh, Nida Fazli, singh, Urdu at 7:11 पूर्वाह्न द्वारा Amarjeet Singh

मुंबई। ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता..कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता’। निदा फाजली की गजलों में जिंदगी की कशमकश को काफी शिद्दत से महसूस किया जा सकता है।
फाजली साहब ने जिंदगी के उतार-चढ़ाव तथा जीवन के सभी पहलुओं को शायद बहुत ही करीब से जिया है। यही वजह है कि उनकी शायरी में जिंदगी की कशिश झलकती है।
12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में जन्मे उर्दू साहित्य जगत के अजीम शायर और गीतकार निदा फाजली को शायरी विरासत में मिली। उनके घर में उर्दू और फारसी के दीवान संग्रह भरे पड़े थे। निदा फाजली के वालिद भी शेरो-शायरी में दिलचस्पी रखते थे और उनका अपना काव्य संग्रह भी था। निदा फाजली अक्सर उनके काव्य संग्रह को पढ़ा करते थे। निदा फाजली ने वर्ष 1954 में स्नातकोत्तर की शिक्षा ग्वालियर कालेज से पूरी की। आजादी के बाद उनका पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया, लेकिन निदा फाजली ने हिंदुस्तान में ही रहने का निर्णय लिया। एक दिन निदा फाजली एक मंदिर से गुजर रहे थे तभी उन्हें सूरदास की एक कविता सुनाई पड़ी। इस कविता के माध्यम से राधा और कृष्ण की जुदाई के प्रसंग को दर्शाया गया था। निदा फाजली इस कविता को सुनकर काफी भावुक हो गए और उन्होंने निर्णय लिया कि वह भी एक कवि के रूप में अपनी पहचान बनाएंगे। निदा फाजली मीर और गालिब की रचनाओं से काफी प्रभावित हुए। उन दिनों उर्दू साहित्य के लेखन की एक सीमा निर्धारित थी। धीरे-धीरे उन्होंने उर्दू साहित्य की बंधी-बंधाई सीमाओं को तोड़ दिया और अपने लेखन का अलग अंदाज बनाया। वर्ष 1964 में अपने सपनों को एक नया रूप देने के लिए वह मुंबई आ गए। मुंबई आने के बाद निदा फाजली को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस बीच उन्होंने धर्मयुग और ब्लिट्ज जैसी पत्रिकाओं में लिखना शुरू कर दिया। अपने लेखन की नई शैली की वजह से निदा फाजली कुछ ही समय में लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब हो गए।
इस दौरान उर्दू साहित्य के कुछ प्रगतिशील लेखकों और कवियों की नजर उन पर पड़ी जो उनकी प्रतिभा से काफी प्रभावित हुए थे। निदा फाजली के अंदर उन्हें एक उभरता हुआ कवि दिखाई दिया और उन्होंने उनको प्रोत्साहित करने एवं हरसंभव सहायता देने की पेशकश की और साथ ही उन्हें मुशायरों के कार्यक्रम में आने का न्योता भी दिया।
इस बीच निदा फाजली मुशायरों में भी हिस्सा लेते रहे जिससे उन्हें पूरे देश भर में शोहरत हासिल होने लगी। सत्तर के दशक में मुंबई में अपने बढ़ते खर्चो को देखकर उन्होंने फिल्मों के लिए भी गीत लिखना शुरू कर दिया। लेकिन फिल्मों की विफलता के बाद निदा फाजली को अपना फिल्मी कैरियर डूबता नजर आया, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपना संघर्ष जारी रखा। धीरे-धीरे मुंबई में उनकी पहचान बनती गई। लगभग दस वर्षो तक मायानगरी मुंबई में संघर्ष करने के बाद वर्ष 1980 मे प्रदर्शित फिल्म ‘आप तो ऐसे ना थे’ में अपने गीत ‘तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है ..’ की सफलता के बाद निदा फाजली कुछ हद तक बतौर गीतकार फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। इस फिल्म की सफलता के बाद निदा फाजली को कई फिल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गए। इन फिल्मों में बीबी ओ बीबी, आहिस्ता आहिस्ता, नजराना प्यार का, जैसी फिल्में शामिल हैं। इस बीच उन्होंने कई छोटे बजट की फिल्में भी की।
संगीतकार खय्याम के संगीत निर्देशन में उन्होंने फिल्म आहिस्ता आहिस्ता के लिए ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नही मिलता..’ गीत लिखा। आशा भोंसले और भूपिंदर सिंह की आवाज में अपने इस गीत सफलता के बाद निदा फाजली ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
इस गीत ने पूरे भारत में धूम मचा दी। इसके बाद निदा फाजली ने सफलता की नई बुलंदियों को छुआ और एक से बढ़कर एक गीत लिखे।
वर्ष 1983 निदा फाजली के सिने कैरियर का अहम पड़ाव साबित हुआ। फिल्म रजिया सुल्तान के निर्माण के दौरान गीतकार निसार अख्तर की आकस्मिक मृत्यु के बाद निर्माता कमाल अमरोही ने निदा फाजली से फिल्म के बाकी गीत को लिखने की पेशकश की। गजल सम्राट जगजीत सिंह ने निदा फाजली के लिए कई गीत गाए, जिनमें वर्ष 1999 मे प्रदर्शित फिल्म ‘सरफरोश’ का यह गीत ‘होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है .’ इन दोनों फनकारों की जोड़ी की बेहतरीन मिसाल है। निदा फाजली के काव्य संग्रहों में मोर नाचे, हमकदम और सफर में धूप होगी प्रमुख है।
वर्ष 1998 मे साहित्य जगत मे निदा फाजली के बहुमूल्य योगदान को देखते हुए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा निदा फाजली को खुसरो अवार्ड, महाराष्ट्र उर्दू अकादमी पुरस्कार, हिंदी उर्दू संगम पुरस्कार, मीर तकवी मीर पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
अब तक निदा फाजली द्वारा लिखी 24 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। अपने जीवन के लगभग 69 वसंत देख चुके निदा फाजली आज भी पूरे जोशो-खरोश के साथ साहित्य और फिल्म जगत को सुशोभित कर रहे है।

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2 टिप्पणियाँ »

  1. PD said,

    खूबसूरत लेख…

  2. arvind mishra said,

    excellent write-up.


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