नवम्बर 26, 2007

स्वभाव से भी ‘गंभीर’ हैं गौतम

Posted in ghazal, ghazal maestro, ghazals, jagjit, jagjit singh tagged , , , , , , , , , , , , at 10:25 पूर्वाह्न द्वारा Amarjeet Singh

गौतम
गंभीर ने ट्वंटी-20 विश्वकप में बेहतरीन बल्लेबाज़ी की थी.

टीम इंडिया के चमकते सितारे बन चुके गौतम गंभीर नाम के मुताबिक़ स्वभाव से भी गंभीर हैं और बचपन से ही क्रिकेट बैट के दीवाने रहे हैं.

हाल में हुए ट्वेंटी-20 विश्वकप में 26 वर्षीय गौतम की बल्लेबाज़ी भारतीय टीम की जान बनी, और विश्वविजेता आस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ खेले गए मैच में उन्हें मैन ऑफ़ मैच का ख़िताब भी मिला था.

गौतम एक नाती से ज्यादा अपनी नानी के बेटे हैं. पेश है उनकी नानी माँ के साथ सूफ़िया शानी की ख़ास बातचीत.

कैसा लग रहा है आपको गौतम को इस मुका़म पर देखकर?

बहुत खुशी होती है और मेरी खुशी तब और दुगनी हो जाती है जब दूसरे लोग भी उसकी खुशी में शामिल होते है.

कितना बदलाव देखती हैं आप नन्हे गौतम में और गौतम गंभीर में?

मुझे तो कोई बदलाव नज़र नहीं आता उसमें मैं शुक्रगुज़ार हूँ ऊपर वाले की कि उसने गौतम को घमंड और नखरों से दूर रखा हैं. हो सकता है मेरे इस नज़रिए में ममता नज़र आए. लेकिन दूसरे और परिवार के लोगों का भी यही कहना है कि गौतम अब भी ज़मीन पर है.

गौतम
गौतम गंभीर बचपन से क्रिकेट बैट के दीवाने रहे हैं.

गौतम खेल में ही ‘गंभीर’ है या पढ़ाई में भी ‘गंभीर’ रहे हैं ?

क्रिकेट क्लब में भेजने से पहले मेरी शर्त ही यही थी गौतम से, कि तुम पढाई पर पूरा ध्यान दोगे. और गौतम कई क्लासों में फ़र्स्ट डिविज़न आया.

गौतम की सबसे अच्छी बात क्या लगती है आपको?

उसका भोलापन–वह दिल में कुछ रखता नहीं है. बल्कि ख़ास बात यह है कि वह कभी झूठ नहीं बोलता.

नन्हें गौतम की कोई शरारत याद है आपको ?

बचपन में उसकी एक ही शरारत थी कि वह सब बच्चों के बैट छीन लिया करता था. और जब वह अपने खेलने के लिए बैट मांगता था तो उसे कपड़े धोने वाली थापी दे दी जाती थी.

गौतम हक़ीकत में “गंभीर” है या सिर्फ़ नाम के ही गंभीर हैं ?

नहीं वह वास्तव में गंभीर है. न वह बचपन में ज्यादा शरारत करता था न अब ज्यादा बात करता है. बल्कि शर्मीले टाइप का है.

क्रिकेट के अलावा और क्या शौक़ है गौतम के?

क्रिकेट के बाद उसे संगीत से बहुत लगाव है. जब फ़ुर्सत में होता है तब या तो पुराने गाने सुनता है या जगजीत सिंह की ग़ज़लें.

आपको क्या कहकर बुलाते हैं गौतम?

वह मुझे नानी मम्मी कहता है और हम सब उसे गौती कहते है.

नानी और कहानी का गहरा रिश्ता है आपसे किस तरह की कहनी सुनने की डिमांड करते थे नन्हे गौतम?

गौती को चिड़िया की या राजा रानी की कहानी पंसद नहीं थी. बल्कि वह शिवाजी या भगतसिंह की कहानी सुनना पंसद करता था. आज भी वह देशभक्ति के गानों का इतना दीवाना है कि कितनी ही जल्दी हो अगर देशभक्ति का गीत आ रहा हो तो रुक कर सुनता ज़रूर है.

नानी के साथ
गौतम गंभीर अपनी नानी के बेहद क़रीब हैं, जो उन्हें प्यार से गौती कहती हैं.

गौतम का दिया हुआ सबसे प्यारा तोहफ़ा आपको क्या लगता है?

मेरे लिए तो वही अनमोल तोहफ़ा है. वैसे मुझे उसने बहुत सुंदर घड़ी दी है जो वह हमेशा मेरी कलाई में बंधा देखना चाहता है.

हर दादी और नानी की तमन्ना होती है कि नाती-पोते का सेहरा देखे….आपकी यह तमन्ना कब पूरी कर रहे हैं गौतम?

वैसे तो गौतम नाती कम बेटा ज्यादा है. तो इन दोनों ही रिश्तों से मेरी दिली इच्छा है उसे दूल्हा बना देखने की. लेकिन गौतम का कहना है कि अभी तो मेरे करियर की शुरुआत है…. मुझे अभी काफी खेलना है.

गौतम को नानी के हाथ की बनी कौन सी चीज़ सबसे ज़्यादा पसंद है?

वैसे तो वह हर चीज़ बड़े चाव से खाता है…लेकिन मेरे हाथ के बने राजमा-चावल और कढ़ी-चावल उसे बेहद पसंद हैं.

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नवम्बर 21, 2007

ग़ज़ल ग़ालिब की होती थी मगर…

Posted in Film, Ghalib, ghazal, ghazal maestro, ghazals, Ghulam Ali, gulzar, Hariharan, jagjit, jagjit singh tagged , , , , , , , , , , , , at 7:57 पूर्वाह्न द्वारा Amarjeet Singh

ग़ज़ल, कविता का एक प्रकार है जिसकी शुरुआत दसवीं शताब्दी में फ़ारसी कविता में हुई थी और बारहवीं शताब्दी में यह इस्लामी सल्तनतों और सूफ़ी संतों के साथ दक्षिण एशिया में आई. उर्दू ग़ज़लें भारत और पाकिस्तान में बहुत प्रचलित और लोकप्रिय हैं. ग़ज़ल के कुछ नियम हैं जैसे मतला, मक़्ता, रदीफ़, काफ़िया, बहर और वज़न. ग़ज़ल की हर पंक्ति को मिस्रा कहा जाता है और दो मिस्रों से मिलकर बनता है शेर. पहले शेर को मतला कहा जाता है और आख़िरी शेर को मक़्ता जिसमें शायर का नाम छिपा होता है. हर मिस्रे के अंतिम शब्द एक जैसे सुनाई देते हैं जैसे मीर की ग़ज़ल का ये शेर देखिए….

देख तो दिल के जां से उठता है
ये धुंआ सा कहां से उठता है.

इसमें उठता है हर शेर के अंत में आएगा जिसे रदीफ़ कहते हैं और उससे पहले मिलते-जुलते शब्द आएँगे जैसे जां से उठता है, मकां से उठता है, जहां से उठता है….इसे काफ़िया कहते हैं. पहले शेर में ये दोनों मिलते जुलते होने चाहिए जबकि बाक़ी के शेरों की पहली पंक्ति में कुछ भी हो सकता है जबकि दूसरी पंक्ति में वह मिलता जुलता होना चाहिए. ग़ज़ल एक लयबद्ध कविता है. हर शेर तबले की थाप पर पढ़ा जा सकता है इसलिए ज़रूरी है कि दोनों मिस्रे बराबर हों. इसे वज़न कहा जाता है. और बहर हिंदी कविता के छंद के समान हुई जो बड़ी या छोटी कैसी भी हो सकती है. ग़ज़ल की एक विशेषता यह भी है कि हर शेर में बात पूरी हो जानी चाहिए.

उर्दू के बहुत से शायरों ने ग़ज़ल को बहुत समृद्ध किया है लेकिन ग़ालिब का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. दुष्यंत ने ग़ज़ल को हिंदी में कहने की कोशिश की और यह प्रयोग काफ़ी सफल रहा. दुष्यंत ने हिंदी ग़ज़ल के ज़रिए जीवन की वास्तविकताओं को उकेरा है. ग़ज़ल का इस्तेमाल हिंदी फ़िल्मों में भी बढ़चढ़कर हुआ है. नूरजहाँ, मलिका पुखराज, बेगम अख़्तर, मुन्नी बेगम, ग़ुलाम अली, मेहंदी हसन, जगजीत सिंह आदि गायकों ने ख़ूब ग़ज़लें गाई हैं.

Source: BBC

नवम्बर 19, 2007

एयरपोर्ट पर जगजीत की झलक को मची होड़

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Nov 18, 01:21 am
पटना। राजधानी में कार्यक्रम के सिलसिले में पहुंचे जगजीत की एक झलक को एयरपोर्ट पर शनिवार को जबदरस्त होड़ मची। परिसर से बाहर आते ही प्रशंसकों ने उनका जबदरस्त स्वागत किया।

अपनी मखमली आवाज के लिए जाने जाने वाले गजल गायक जगजीत सिंह के प्रशंसकों की राजधानी में भी कोई कमी नहीं है। कार्यक्रम के सिलसिले में इंडियन एयरलाइंस की उड़ान से अपराह्न चार बजे के आसपास मुंबई से पटना पहुंचे जगजीत सिंह को प्रशंसकों ने परिसर के भीतर आगमन हाल में ही घेर लिया। बकायदा गुलदस्ता देकर उनका विधिवत स्वागत किया गया। जगजीत सिंह के पहुंचने की खबर मिलते ही लोग उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़े। उनकी एक झलक पाकर एयरपोर्ट के कर्मचारियों से लेकर विमान यात्री तक काफी रोमांचित दिखे। परिसर के बाहर भी उनके प्रशंसकों की बड़ी तादाद मौजूद थी।

Source: Jagran

नवम्बर 17, 2007

जगजीत सिंह गवले पहिला बेर भोजपुरी गाना

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दुनिया भर में फैलल जगजीत सिंह के फैन लोग खातिर एगो नया खबर बा. विश्व-प्रसिद्ध गजल गायक जगजीत सिंह पहिला बेर फिल्म पुरब खातिर एगो भोजपुरी गाना गइलें ह. एह फिल्म में भोजपुरी सुपरस्टार मनोज तिवारी मृदुल मुख्य भूमिका में नजर अइहें.

बात अइसन भइल कि, मुम्बई में जगजीत सिंह के स्टुडियो में फिल्म पुरब के गीतन के मिक्सिंग चलत रहुये, ताले जगजीत जी घुमत- घामत ओहिजा आ गइलन. जवन गाना के मिक्सिंग चलत रहे, उ मनोज तिवारी मृदुल का आवाज में रिकार्डेड रहे.

गाना के धुन आ बोल सुन के जगजीत जी कहलन – “मुझे तो पता ही नहीं था कि भोजपुरी में इस स्तर के गीत भी रिकार्ड होते हैं. मैं इस गीत को गाना चाहता हुँ.” इ सुन के स्टुडियो में बैठल लोग के खुशी के ठिकाना ना रहल.

दु दिन बाद जगजीत जी आके लाल सिन्हा (संगीतकार) के बोलवलन आ कहलन – “आज मैं तुम्हारा गीत गा रहा हुँ.”

लाल सिन्हा खुशी का मारे फोन करुअन गीतकार बिपिन बहार के – “बिपिन बाबु, जल्दी गीत लेके आईं. जगजीत जी स्टुडियो में इंतजार करत बाडन.”

इ सुनला का संगे, मानो पांव में पाँख लाग गइल बिपिन के… गीत के रिकार्डिंग जगजीत जी के सुरमयी आवाज में शुरु भईल – ज़ब पूरब जागी, त होई सबेरा…

एह फिल्म के निर्माता बाडे मुर्तजा जाफरी, जबकि एकर निर्देशन अभयादित्य सिंह क रहल बाडे. फिल्म के गीत बिपिन बहार लिखले बाडे, आ ओकरा के अपना संगीत से सजवले बाडे लाल सिन्हा.

एह सब में एगो खास बात इ भी रहल ह कि, अपना जिन्दगी के पहिला भोजपुरी गाना खातिर जगजीत जी कवनो तरह के पारिश्रमिक ना लेहनी ह.

Source: bhojpuria.com

नवम्बर 16, 2007

सुनने के नहीं देखने वाले बन रहे हैं गाने

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शंकर साहनी
सिंगर

दरअसल कंपनियां जल्द से जल्द रिस्पॉन्स चाहती हैं, इसलिए सॉफ्ट गानों और लिरिक्स पर ज्यादा ध्यान नहीं देतीं। उन्हें लगता है कि कोई ऐसा गाना लाया जाए, जिससे रातों-रात वारे-न्यारे हो जाएं। अब तो गानों की कहानी दिखाने वाली ज्यादा रह गई है और सुनने वाली कम। यह बदलाव नेगेटिव ही है, क्योंकि गानों में बस ग्लैमर और दिखावा रह गया है। संजीदा अल्फाज और विडियो कंटेंट का होना बहुत जरूरी है। अच्छे गाने तो हमेशा ही पसंद किए जाते रहे हैं। सूफी कलाम से लेकर अब तक जितने भी अच्छे गाने आए, उन्हें कौन भूल पाया है। कुछ अच्छे लिरिक्स वाले गाने भी आजकल आ रहे हैं। जो गाने अच्छे होते हैं, वे चलते ही हैं, रुकते कहां हैं।

और भी संगीत हैं सुनने के लिए

जगजीत सिंह

गजल गायक

वक्त के साथ सब कुछ चेंज होता ही है। लेकिन जो ओरिजिनल और अच्छा होता है, वही सर्वाइव करता है। फिल्मी म्यूजिक में आए बदलाव को ही आप क्यों देखते हैं? सिर्फ वही एक म्यूजिक नहीं है। नॉन फिल्मी म्यूजिक जैसे क्लासिकल, भजन, गजल आदि को देखें, जिसमें पॉजिटिव चेंज आ रहा है। इसमें आया बदलाव उसकी बेहतरी के लिए ही है। फिल्मी म्यूजिक और पॉप ऐल्बम में कुछ लोग पैसे कमाने के चक्कर में वल्गेरिटी डाल रहे हैं। आजकल तो सिंगर खुद ही लिरिक्स लिखने लगे हैं। जिस तरह के लिरिक्स लिखे जा रहे हैं, क्या उनका कोई मतलब है? लेकिन जो लोग ऐसा करते हैं, उनके लिए तो यह चेंज पॉजिटिव ही है।

पता नहीं कहां-कहां से गाएंगे लोग
राजू श्रीवास्तव
हास्य कलाकार

पहले लोग दिल और दिमाग से गाते थे, फिर मुंह से गाने लगे। आजकल नाक से गाने लगे हैं। आगे पता नहीं कहां-कहां से गाएंगे। अब जो गाने बन रहे हैं, उनमें कोई तबला वगैरह तो बजता नहीं है, बस इलेक्ट्रॉनिक इंस्ट्रुमेंट्स का प्रयोग होता है। इन्हें सुनकर ऐसा लगता है, जैसे किसी फैक्ट्री में आ गए हैं, जहां लोग हाथ में हथौड़ी, फावड़ा, आरी लेकर टोपी लगाए हुए इधर-उधर घूम रहे हैं। आजकल की फीमेल सिंगर्स को देखिए कैसे-कैसे गाने गाती हैं, जैसे किसी को डरा रही हों। भूत हूं मैं… भूत हूं!! सुनकर लगता है, मानो सब कब्रें फाड़कर बाहर निकलकर आए हों। कोई खुश नहीं है, सब दुखी होकर गाने गा रहे हैं।

कुछ मीनिंग और मिठास होना जरूरी
पूनम भगत
फैशन डिजाइनर

आजकल जो बेसिरपैर के गाने आ रहे हैं, उनका मतलब मुझे तो समझ नहीं आता। पुराने जमाने में जिस तरह के गाने बनते थे, पता नहीं वैसे गाने अब क्यों नहीं बन रहे हैं। यंगर जेनरेशन को शायद ये गाने पसंद आते हों। गाने में कुछ मीनिंग, उसमें कुछ मिठास भी तो होनी चाहिए। मगर अब यह कम ही गानों में देखने को मिलती है। इन्हें तीन कैटिगरी में बांट सकते हैं। पहला रोमांटिक सॉन्ग, जिनके अच्छे बोल होते हैं, दूसरा जो डिस्को म्यूजिक पर बजते हैं और उनका मतलब समझ नहीं आता। तीसरा इन दोनों के बीच की कैटिगरी वाले गाने। ऐसा नहीं है कि इस बदले हुए दौर में सिर्फ बेहूदा गाने ही बन रहे हैं, इस दौरान ‘परिणीता’ और ‘कभी खुशी कभी गम’ जैसी फिल्मों के अच्छे गाने भी आए हैं।

ट्रेंड का कोई लॉजिक नहीं होता
अयान अली खान

संगीत में आजकल बहुत अच्छा काम हो रहा है। पिछले कुछ सालों के दौरान स्पैनिश, जापानी, लैटिन म्यूजिक का मिश्रण भारतीय संगीत में हुआ है। ग्लोबल कल्चर के इस प्रभाव का फायदा यह हुआ है कि लोगों को हर तरह का संगीत सुनने का मौका मिला है। बॉलिवुड के म्यूजिक में तो बदलाव आया ही है, साथ ही क्लासिकल म्यूजिक भी प्रभावित हुआ है। समय के साथ बदलाव आते ही हैं। गीतकार और आटिर्स्ट के लिए यह क्रिएटिव चेंज है। इसके सही या गलत का फैसला करना ठीक नहीं है। ट्रेंड क्या है, क्या चल रहा है, उसका कोई लॉजिक या फॉर्म्युला नहीं है। फिर भी लोग इसे पसंद कर ही रहे हैं, उनकी सीडी खरीद रहे हैं। सभी आर्टिस्ट अपना बेस्ट आउटपुट देना चाहते हैं, कोई भी जान बूझकर खराब चीज नहीं बनाएगा।

Source: NBT

नवम्बर 14, 2007

उस्ताद गुलाम अली लाइव इन कंसर्ट, सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम, दिल्ली

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उस्ताद गुलाम अली लाइव इन कंसर्ट

स्थान: सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम कॉम्प्लेक्स, अगस्त क्रांति मार्ग, नई दिल्ली
समय: 6:30 PM
फ़ोन: 011-32640810, 9968150101, 9212572703

नवम्बर 13, 2007

..कौन कहता है ¨रदों को खुदा याद नहीं’

Posted in गजल, गुलाम अली, जगजीत सिंह, ghazal, ghazal maestro, ghazals, Ghulam Ali, jagjit, jagjit singh tagged , , , , , , at 7:06 पूर्वाह्न द्वारा Amarjeet Singh

कोटा. गजल सम्राट गुलाम अली का जादू उनके प्रशंसकों के सिर चढ़कर बोलने लगा है। 26 बरस पहले कोटा आए गुलाम अली को सुन चुके उनके प्रशंसकों ने उस gulam aliजमाने की यादों को सहेजना भी शुरू कर दिया है। उनके प्रशंसक कहते हैं कि गुलाम अली को कोटा लाने में प्रसिद्ध कव्वाल युसूफ अली माध्यम बने थे।

गुलाम अली के प्रशंसक तरूमीत सिंह बेदी बताते हैं कि वह 18 जनवरी 1981 की सर्द रात थी, जिसे गुलाम अली की आवाज ने एक यादगार रात बना दिया। बेदी कहते हैं कि गुलाम अली ऐसे गायक हैं जिन्हें कानों से नहीं दिल से सुना जाता है। गुलाम अली के प्रशंसकों में शामिल तत्कालीन विद्युत मंडल में मुख्य अभियंता बीएस झा, डीसीएम के सीएमडी एन सी ब्रrा, जगजीत सिंह बेदी, पारस झांझरी, के एल जोहरी समेत बड़ी संख्या में शहर के प्रबुद्ध नागरिक यहां मौजूद थे।

छोटी बहर की गजल गाने के लिए विख्यात गुलाम अली ने कुछ इस तरह शुरुआत की ‘जाम जब पीता हूं, मुंह से कहता हूं बिस्मिल्लाह, कौन कहता है रिंदों को खुदा याद नहीं’ इसके बाद शुरू हुआ फरमाइशों का दौर जो पूरी रात जारी रह। एक से बढ़कर एक गजल पर श्रोता झूमते रहे। श्रीराम कलामंदिर का परिसर तालियों से गूंज उठा जब फरमाइश पर उन्होंने सुनाया कि ‘कौन समझाए कि क्या रंग है मयखाने का, आंख साकी की उठे नाम हो पैमाने का’। ऐसी ही गजलों को सुनने का एक बार फिर मौका मिलेगा श्रोताओं को 28 अक्टूबर को।

दशहरा मैदान स्थित विजयश्री रंगमंच पर गुलाम अली की गजल संध्या के कार्यक्रम को लेकर व्यापक उत्साह का माहौल है।

प्रोफाइल
* पाकिस्तान के स्यालकोट केलके में 1940 में गुलाम अली का जन्म हुआ।
* पिता गजल गायक व सारंगी वादक थे।गुलाम अली ने 15 बरस की उम्र में गायन सीखना शुरू किया।
* बड़े गुलाम अली से प्रभावित उनके पिता ने नाम ही गुलाम रख दिया।
* 1960 में सबसे पहले लाहौर रेडियो स्टेशन से गजल गायकी की शुरुआत।

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