नवम्बर 21, 2007

ग़ज़ल ग़ालिब की होती थी मगर…

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ग़ज़ल, कविता का एक प्रकार है जिसकी शुरुआत दसवीं शताब्दी में फ़ारसी कविता में हुई थी और बारहवीं शताब्दी में यह इस्लामी सल्तनतों और सूफ़ी संतों के साथ दक्षिण एशिया में आई. उर्दू ग़ज़लें भारत और पाकिस्तान में बहुत प्रचलित और लोकप्रिय हैं. ग़ज़ल के कुछ नियम हैं जैसे मतला, मक़्ता, रदीफ़, काफ़िया, बहर और वज़न. ग़ज़ल की हर पंक्ति को मिस्रा कहा जाता है और दो मिस्रों से मिलकर बनता है शेर. पहले शेर को मतला कहा जाता है और आख़िरी शेर को मक़्ता जिसमें शायर का नाम छिपा होता है. हर मिस्रे के अंतिम शब्द एक जैसे सुनाई देते हैं जैसे मीर की ग़ज़ल का ये शेर देखिए….

देख तो दिल के जां से उठता है
ये धुंआ सा कहां से उठता है.

इसमें उठता है हर शेर के अंत में आएगा जिसे रदीफ़ कहते हैं और उससे पहले मिलते-जुलते शब्द आएँगे जैसे जां से उठता है, मकां से उठता है, जहां से उठता है….इसे काफ़िया कहते हैं. पहले शेर में ये दोनों मिलते जुलते होने चाहिए जबकि बाक़ी के शेरों की पहली पंक्ति में कुछ भी हो सकता है जबकि दूसरी पंक्ति में वह मिलता जुलता होना चाहिए. ग़ज़ल एक लयबद्ध कविता है. हर शेर तबले की थाप पर पढ़ा जा सकता है इसलिए ज़रूरी है कि दोनों मिस्रे बराबर हों. इसे वज़न कहा जाता है. और बहर हिंदी कविता के छंद के समान हुई जो बड़ी या छोटी कैसी भी हो सकती है. ग़ज़ल की एक विशेषता यह भी है कि हर शेर में बात पूरी हो जानी चाहिए.

उर्दू के बहुत से शायरों ने ग़ज़ल को बहुत समृद्ध किया है लेकिन ग़ालिब का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. दुष्यंत ने ग़ज़ल को हिंदी में कहने की कोशिश की और यह प्रयोग काफ़ी सफल रहा. दुष्यंत ने हिंदी ग़ज़ल के ज़रिए जीवन की वास्तविकताओं को उकेरा है. ग़ज़ल का इस्तेमाल हिंदी फ़िल्मों में भी बढ़चढ़कर हुआ है. नूरजहाँ, मलिका पुखराज, बेगम अख़्तर, मुन्नी बेगम, ग़ुलाम अली, मेहंदी हसन, जगजीत सिंह आदि गायकों ने ख़ूब ग़ज़लें गाई हैं.

Source: BBC

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नवम्बर 14, 2007

उस्ताद गुलाम अली लाइव इन कंसर्ट, सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम, दिल्ली

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उस्ताद गुलाम अली लाइव इन कंसर्ट

स्थान: सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम कॉम्प्लेक्स, अगस्त क्रांति मार्ग, नई दिल्ली
समय: 6:30 PM
फ़ोन: 011-32640810, 9968150101, 9212572703

नवम्बर 13, 2007

..कौन कहता है ¨रदों को खुदा याद नहीं’

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कोटा. गजल सम्राट गुलाम अली का जादू उनके प्रशंसकों के सिर चढ़कर बोलने लगा है। 26 बरस पहले कोटा आए गुलाम अली को सुन चुके उनके प्रशंसकों ने उस gulam aliजमाने की यादों को सहेजना भी शुरू कर दिया है। उनके प्रशंसक कहते हैं कि गुलाम अली को कोटा लाने में प्रसिद्ध कव्वाल युसूफ अली माध्यम बने थे।

गुलाम अली के प्रशंसक तरूमीत सिंह बेदी बताते हैं कि वह 18 जनवरी 1981 की सर्द रात थी, जिसे गुलाम अली की आवाज ने एक यादगार रात बना दिया। बेदी कहते हैं कि गुलाम अली ऐसे गायक हैं जिन्हें कानों से नहीं दिल से सुना जाता है। गुलाम अली के प्रशंसकों में शामिल तत्कालीन विद्युत मंडल में मुख्य अभियंता बीएस झा, डीसीएम के सीएमडी एन सी ब्रrा, जगजीत सिंह बेदी, पारस झांझरी, के एल जोहरी समेत बड़ी संख्या में शहर के प्रबुद्ध नागरिक यहां मौजूद थे।

छोटी बहर की गजल गाने के लिए विख्यात गुलाम अली ने कुछ इस तरह शुरुआत की ‘जाम जब पीता हूं, मुंह से कहता हूं बिस्मिल्लाह, कौन कहता है रिंदों को खुदा याद नहीं’ इसके बाद शुरू हुआ फरमाइशों का दौर जो पूरी रात जारी रह। एक से बढ़कर एक गजल पर श्रोता झूमते रहे। श्रीराम कलामंदिर का परिसर तालियों से गूंज उठा जब फरमाइश पर उन्होंने सुनाया कि ‘कौन समझाए कि क्या रंग है मयखाने का, आंख साकी की उठे नाम हो पैमाने का’। ऐसी ही गजलों को सुनने का एक बार फिर मौका मिलेगा श्रोताओं को 28 अक्टूबर को।

दशहरा मैदान स्थित विजयश्री रंगमंच पर गुलाम अली की गजल संध्या के कार्यक्रम को लेकर व्यापक उत्साह का माहौल है।

प्रोफाइल
* पाकिस्तान के स्यालकोट केलके में 1940 में गुलाम अली का जन्म हुआ।
* पिता गजल गायक व सारंगी वादक थे।गुलाम अली ने 15 बरस की उम्र में गायन सीखना शुरू किया।
* बड़े गुलाम अली से प्रभावित उनके पिता ने नाम ही गुलाम रख दिया।
* 1960 में सबसे पहले लाहौर रेडियो स्टेशन से गजल गायकी की शुरुआत।

अक्टूबर 13, 2007

गजल की रूह से छेड़छाड़ करना पसंद नहीं : गुलाम अली

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गजल की बात चले और गुलाम अली का जिक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। उनके जितने फैन उनकी सरजमीं पाकिस्तान में हैं, उससे कई गुना हिंदुस्तान और दुनिया भर में। आज शाम राजधानी की ऐतिहासिक धरोहर कुतुब मीनार पर गुलाम अली की गजलें फिर गूंजेंगी। नवभारत टाइम्स द्वारा आयोजित गजलों की इस खास शाम में प्रस्तुति देने के लिए खासतौर से दिल्ली आए गजलों की दुनिया के बेताज बादशाह .गुलाम अली से हमारी संवाददाता प्रियंका सिंह और प्रशांत सोनी ने खास मुलाकात की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश :

दिल्ली आपके दिल के कितने करीब है?

दिल्ली तो दिलवालों का शहर है। इसके बारे में जितना कहा जाए, कम है। यहां का खाना, मौसम, अवाम, ऐतिहासिक जगहें, हरियाली, सब कुछ मुझे पसंद है। दिल्ली मेरे भी दिल के उतने ही करीब है, जितनी आपके या किसी और के। यहां परफॉर्म करना मुझे अच्छा लगता है। वैसे दिल्ली कई मायनों में लाहौर से काफी मिलती-जुलती है।

इसी साल मार्च के महीने में पुराने किले में आपकी गजलें गूंजी थी। अब कुतुब मीनार के साये में गाएंगे। हिंदुस्तान की इन ऐतिहासिक धरोहरों के समीप प्रस्तुति देना आपके लिए कितना खास है?

इन जगहों पर प्रस्तुति देना वाकई मेरे लिए बहुत खास है। आगरे का ताजमहल हो या बनारस के घाट, या फिर दिल्ली का पुराना किला और कुतुब मीनार, जब मैं इन जगहों पर गाता हूं, तो मुझे अहसास होता है कि मैं एक ऐसी जगह पर गा रहा हूं, जिसका ऐतिहासिक महत्व है। इन जगहों का पारंपरिक माहौल गजल की पुरानी रवायत के करीब नजर आता है। वैसे मेरी गायकी भी काफी पारंपरिक है।

हिंदुस्तान में परफॉर्म करना आपको कैसा लगता है?

यहां आकर परफॉर्म करना मेरे लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के हर कलाकार के लिए खास महत्व रखता है। यहां सुननेवालों से हर कलाकार को जैसी मुहब्बत और इज्जत मिलती है, वैसी दुनिया में और कहीं नहीं मिलती। यहां के लोगों का प्यार ही है, जो हर बार मुझे यहां खींच लाता है। यहां मेरे हर कार्यक्रम में जिस तरह भीड़ उमड़ती है, उसे देखकर अहसास होता है कि वाकई मैंने यहां के लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई है। यह मेरे लिए बड़े फख्र और खुशी की बात है।

लोग कहते हैं कि जमाना बदला, गजल बदली, लेकिन गुलाम अली नहीं बदले। क्या आप इस बात से सहमत हैं?

सही है कि वक्त के साथ काफी कुछ बदला। चीजें काफी कॉमर्शलाइज्ड हो गई हैं। लोगों के पास अब वक्त भी कम है लेकिन जहां तक मेरी बात है तो मैं मानता हूं कि हर कलाकार की अपनी अलग शैली होती है। यह सच है कि समय के साथ-साथ गजल में कई तरह के बदलाव आए हैं, लेकिन मुझे लगता है कि ट्रडिशनल तरीके से गजल गाना अब मेरी पहचान बन चुकी है। लोग शायद इसीलिए आज भी मुझे और मेरी गायकी को पसंद करते हैं। ऐसा नहीं है कि मैं गजलों में नए प्रयोग करने के खिलाफ हूं, लेकिन प्रयोग के नाम पर गजल की रूह के साथ छेड़छाड़ करना मुझे पसंद नहीं है। मैं कभी अपना क्लासिकल बेस नहीं छोड़ता।

‘ चुपके-चुपके रात दिन…’ .गाल आपकी पहचान बन चुकी है। इस .गाल में ऐसा क्या है कि लोग आज भी इसे उतना ही पसंद करते हैं?

सच कहा आपने। यह गजल मेरी पहचान बन चुकी है, इसीलिए मेरे लिए बहुत खास है। मेरे स्टेज पर पहुंचते ही लोग इस गजल की फरमाइश शुरू कर देते हैं। दरअसल इस गजल के बोल और इसकी कंपोजिशन इतनी खास है कि हर दौर के लोगों को यह पसंद आती है। मैंने सबसे पहले रेडियो पाकिस्तान पर यह गजल गाई थी और जहां तक मेरा ख्याल है, उसके बाद से मेरी ऐसी कोई परफॉर्मेन्स नहीं रही, जब मैंने यह गजल न गाई हो।

हिंदुस्तानी गजल गायकों के बारे में आपकी क्या राय है?

हिंदुस्तानियों के दिलों में भी गजल का उतना ही खास मुकाम है, जितना पाकिस्तानियों के दिलों में है। यही वजह है कि यहां आज भी गजल की रवायत मौजूद है। तलत अजीज, हरिहरन, पंकज उधास और पीनाज मसानी जैसे कई फनकारों ने इसे सजाया, संवारा और संभाला है। जगजीत सिंह का तो इसमें सबसे खास योगदान रहा है। पाकिस्तान में भी लोग उन्हें चाहते हैं।

उभरते गायकों को आप क्या नसीहत देना चाहेंगे?

मैं सिर्फ यही कहूंगा कि ‘सचाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से, खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से।’ कहने का मतलब यह कि जो लोग लगन और मेहनत से संगीत सीख रहे हैं, वे जरूर आगे बढ़ेंगे। उभरते कलाकारों से मैं यही कहना चाहूंगा कि क्लासिकल का बेस न छोड़ें, क्योंकि वही संगीत का आधार है। अगर गजल की बात करें तो उर्दू की अच्छी समझ भी जरूरी है।

पाकिस्तान और हिंदुस्तान के आपसी रिश्तों के बारे में आपकी क्या राय है?

हमें यह समझना चाहिए कि अगर हम आपस में एक हो जाएं, आपसी समझदारी बढ़ाएं तो फिर दुनिया की कोई ताकत हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। मुझे लगता है कि दोनों मुल्कों के बीच आपसी समझदारी बढ़ रही है, रिश्ते सुधर रहें हैं। रमजान का पाक महीना है और मैं अल्लाह ताला से गुजारिश करता हूं कि इन दोनों मुल्कों में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अमन-चैन कायम रहे।

… और रिश्तों को सुधारने में संगीत की भूमिका!

संगीत हमेशा से सीमाओं से परे रहा है। दोनों मुल्कों के कलाकार एक-दूसरे के यहां खुलकर परफॉर्म कर रहे हैं और खासे पसंद भी किए जा रहे हैं। इससे अवाम में भाईचारा बढ़ता है।

टैलंट हंट प्रोग्रामों खासकर एक कार्यक्रम में हिंदुस्तानी व पाकिस्तानी उभरते कलाकारों के बीच मुकाबले को आप किस रूप में देखते हैं?

यह बहुत ही अच्छा है। पाक से गायकों का चयन मैंने ही किया था। हालांकि इस तरह के प्रोग्राम में कई बार वोटिंग के आधार पर कुछ नाकाबिल लोग भी आगे बढ़ जाते हैं। फिर भी दोनों देशों के लोग इन गायकों को सराह रहे हैं, उनका समर्थन कर रहे हैं, यह बहुत ही अच्छी बात है।

फास्ट म्यूजिक के चलन के बीच गजल का क्या भविष्य नजर आता है?

देखिए, फिल्मों में अच्छा काम करने के बावजूद मैंने ज्यादा काम नहीं किया। फिल्मों में गजल के लिए ज्यादा स्कोप नहीं होता। लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता कि संगीत से संजीदगी घट रही है। मुझे सुनने सिर्फ वही लोग आते हैं, जिन्हें वाकई संगीत की समझ होती है। वैसे, जब तक अच्छे गानेवाले हैं और अच्छे सुनने वाले हैं, गजल को कोई नुकसान नहीं है।

दिल्ली की अवाम को आपका क्या संदेश है?

दिल्ली एक बेहद खूबसूरत और ऐतिहासिक शहर है। यहां के बाशिंदों को मेरा संदेश है कि वे इस विरासत से प्यार करें और इसे संजो कर रखें। गर्मजोशी बनाए रखें और अच्छे गायकी को भी अपने दिल में बसाए रखें।

Source: एनबीटी