नवम्बर 21, 2007

ग़ज़ल ग़ालिब की होती थी मगर…

Posted in Film, Ghalib, ghazal, ghazal maestro, ghazals, Ghulam Ali, gulzar, Hariharan, jagjit, jagjit singh tagged , , , , , , , , , , , , at 7:57 पूर्वाह्न द्वारा Amarjeet Singh

ग़ज़ल, कविता का एक प्रकार है जिसकी शुरुआत दसवीं शताब्दी में फ़ारसी कविता में हुई थी और बारहवीं शताब्दी में यह इस्लामी सल्तनतों और सूफ़ी संतों के साथ दक्षिण एशिया में आई. उर्दू ग़ज़लें भारत और पाकिस्तान में बहुत प्रचलित और लोकप्रिय हैं. ग़ज़ल के कुछ नियम हैं जैसे मतला, मक़्ता, रदीफ़, काफ़िया, बहर और वज़न. ग़ज़ल की हर पंक्ति को मिस्रा कहा जाता है और दो मिस्रों से मिलकर बनता है शेर. पहले शेर को मतला कहा जाता है और आख़िरी शेर को मक़्ता जिसमें शायर का नाम छिपा होता है. हर मिस्रे के अंतिम शब्द एक जैसे सुनाई देते हैं जैसे मीर की ग़ज़ल का ये शेर देखिए….

देख तो दिल के जां से उठता है
ये धुंआ सा कहां से उठता है.

इसमें उठता है हर शेर के अंत में आएगा जिसे रदीफ़ कहते हैं और उससे पहले मिलते-जुलते शब्द आएँगे जैसे जां से उठता है, मकां से उठता है, जहां से उठता है….इसे काफ़िया कहते हैं. पहले शेर में ये दोनों मिलते जुलते होने चाहिए जबकि बाक़ी के शेरों की पहली पंक्ति में कुछ भी हो सकता है जबकि दूसरी पंक्ति में वह मिलता जुलता होना चाहिए. ग़ज़ल एक लयबद्ध कविता है. हर शेर तबले की थाप पर पढ़ा जा सकता है इसलिए ज़रूरी है कि दोनों मिस्रे बराबर हों. इसे वज़न कहा जाता है. और बहर हिंदी कविता के छंद के समान हुई जो बड़ी या छोटी कैसी भी हो सकती है. ग़ज़ल की एक विशेषता यह भी है कि हर शेर में बात पूरी हो जानी चाहिए.

उर्दू के बहुत से शायरों ने ग़ज़ल को बहुत समृद्ध किया है लेकिन ग़ालिब का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. दुष्यंत ने ग़ज़ल को हिंदी में कहने की कोशिश की और यह प्रयोग काफ़ी सफल रहा. दुष्यंत ने हिंदी ग़ज़ल के ज़रिए जीवन की वास्तविकताओं को उकेरा है. ग़ज़ल का इस्तेमाल हिंदी फ़िल्मों में भी बढ़चढ़कर हुआ है. नूरजहाँ, मलिका पुखराज, बेगम अख़्तर, मुन्नी बेगम, ग़ुलाम अली, मेहंदी हसन, जगजीत सिंह आदि गायकों ने ख़ूब ग़ज़लें गाई हैं.

Source: BBC

अप्रैल 21, 2007

गुलजार देंगे स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि

Posted in gulzar, jagjit, jagjit singh, singh at 8:20 पूर्वाह्न द्वारा Amarjeet Singh

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 150 वीं वर्षगांठ के मौके पर संसद भवन में दस मई को एक भव्य आयोजन किया गया है जिसमें 1857 में अंग्रेजों से लोहा लेने वाले वीरों को गुलजार, शुभा मुद्दगल और जगजीत सिंह जैसे विख्यात कलाकार गीत और गजल के जरिए श्रद्धांजलि देंगे।

मशहूर गजल गायक जगजीत सिंह ने बताया कि संसद के ऐतिहासिक केन्द्रीय कक्ष में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में वे बहादुरशाह जफर की मशहूर गजल ‘ लगता नहीं जी मेरा उजड़े दयार में, किसकी बनी है आलमें न पायदार में’ गाएँगे।

दूसरी ओर मशहूर गायिका शुभा मुद्दगल अंग्रजों से लोहा लेने वाली वीरांगना झांसी की रानी की वीरता पर प्रख्यात कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखित मशहूर कविता खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी को अपने सुरों में ढालेंगी।

लोकसभा सचिवालय के सूत्रों ने बताया कि मशहूर फिल्मकार और गीतकार गुलजार इस अवसर पर खासतौर से तैयार किया गया राष्ट्र भक्ति भरा एक गीत प्रस्तुत करेंगे।

संसद की ओर से संभवत: पहली बार आयोजित हो रहे इस तरह के कार्यक्रम को राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी संबोधित करेंगे।

कार्यक्रम में दोनों सदनों के सांसद हिस्सा लेंगे। इस मौके पर स्वतंत्रता संग्राम के संबंध में एक वृत चित्र भी दिखाया जाएगा। यह कार्यक्रम सुबह साढे नौ बजे से करीब पौने ग्यारह रह बजे तक चलेगा।