दिसम्बर 28, 2007

जगजीत सिंह की हुई वापसी

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28 दिसम्बर 2007
कुछ सप्ताह पहले ग़जल सम्राट जगजीत सिंह अस्पताल में भर्ती थे। उन्हें दिमाग में खून का प्रवाह कम हो गया था। अफवाह थी कि उन्हें लकवा का दौरा पड़ा है पर शुक्र है कि यह अफवाह झूठी साबित हुई।

अब वे पूरी तरह से तंदुरुस्त हैं और उन्होंने अपनी वापसी एक ग़जल शो ‘यादें’ से की। जगजीत सिंह के इस गजल कार्यक्रम का आयोजन पक्षाघात से जुड़ी संस्‍था ‘आदी’ ने किया था।

यह कार्यक्रम नई दिल्ली के सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में 25 दिसम्बर को आयोजित किया गया था।

Source: Josh18

नवम्बर 19, 2007

एयरपोर्ट पर जगजीत की झलक को मची होड़

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Nov 18, 01:21 am
पटना। राजधानी में कार्यक्रम के सिलसिले में पहुंचे जगजीत की एक झलक को एयरपोर्ट पर शनिवार को जबदरस्त होड़ मची। परिसर से बाहर आते ही प्रशंसकों ने उनका जबदरस्त स्वागत किया।

अपनी मखमली आवाज के लिए जाने जाने वाले गजल गायक जगजीत सिंह के प्रशंसकों की राजधानी में भी कोई कमी नहीं है। कार्यक्रम के सिलसिले में इंडियन एयरलाइंस की उड़ान से अपराह्न चार बजे के आसपास मुंबई से पटना पहुंचे जगजीत सिंह को प्रशंसकों ने परिसर के भीतर आगमन हाल में ही घेर लिया। बकायदा गुलदस्ता देकर उनका विधिवत स्वागत किया गया। जगजीत सिंह के पहुंचने की खबर मिलते ही लोग उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़े। उनकी एक झलक पाकर एयरपोर्ट के कर्मचारियों से लेकर विमान यात्री तक काफी रोमांचित दिखे। परिसर के बाहर भी उनके प्रशंसकों की बड़ी तादाद मौजूद थी।

Source: Jagran

नवम्बर 14, 2007

उस्ताद गुलाम अली लाइव इन कंसर्ट, सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम, दिल्ली

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उस्ताद गुलाम अली लाइव इन कंसर्ट

स्थान: सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम कॉम्प्लेक्स, अगस्त क्रांति मार्ग, नई दिल्ली
समय: 6:30 PM
फ़ोन: 011-32640810, 9968150101, 9212572703

अक्टूबर 13, 2007

गजल की रूह से छेड़छाड़ करना पसंद नहीं : गुलाम अली

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गजल की बात चले और गुलाम अली का जिक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। उनके जितने फैन उनकी सरजमीं पाकिस्तान में हैं, उससे कई गुना हिंदुस्तान और दुनिया भर में। आज शाम राजधानी की ऐतिहासिक धरोहर कुतुब मीनार पर गुलाम अली की गजलें फिर गूंजेंगी। नवभारत टाइम्स द्वारा आयोजित गजलों की इस खास शाम में प्रस्तुति देने के लिए खासतौर से दिल्ली आए गजलों की दुनिया के बेताज बादशाह .गुलाम अली से हमारी संवाददाता प्रियंका सिंह और प्रशांत सोनी ने खास मुलाकात की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश :

दिल्ली आपके दिल के कितने करीब है?

दिल्ली तो दिलवालों का शहर है। इसके बारे में जितना कहा जाए, कम है। यहां का खाना, मौसम, अवाम, ऐतिहासिक जगहें, हरियाली, सब कुछ मुझे पसंद है। दिल्ली मेरे भी दिल के उतने ही करीब है, जितनी आपके या किसी और के। यहां परफॉर्म करना मुझे अच्छा लगता है। वैसे दिल्ली कई मायनों में लाहौर से काफी मिलती-जुलती है।

इसी साल मार्च के महीने में पुराने किले में आपकी गजलें गूंजी थी। अब कुतुब मीनार के साये में गाएंगे। हिंदुस्तान की इन ऐतिहासिक धरोहरों के समीप प्रस्तुति देना आपके लिए कितना खास है?

इन जगहों पर प्रस्तुति देना वाकई मेरे लिए बहुत खास है। आगरे का ताजमहल हो या बनारस के घाट, या फिर दिल्ली का पुराना किला और कुतुब मीनार, जब मैं इन जगहों पर गाता हूं, तो मुझे अहसास होता है कि मैं एक ऐसी जगह पर गा रहा हूं, जिसका ऐतिहासिक महत्व है। इन जगहों का पारंपरिक माहौल गजल की पुरानी रवायत के करीब नजर आता है। वैसे मेरी गायकी भी काफी पारंपरिक है।

हिंदुस्तान में परफॉर्म करना आपको कैसा लगता है?

यहां आकर परफॉर्म करना मेरे लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के हर कलाकार के लिए खास महत्व रखता है। यहां सुननेवालों से हर कलाकार को जैसी मुहब्बत और इज्जत मिलती है, वैसी दुनिया में और कहीं नहीं मिलती। यहां के लोगों का प्यार ही है, जो हर बार मुझे यहां खींच लाता है। यहां मेरे हर कार्यक्रम में जिस तरह भीड़ उमड़ती है, उसे देखकर अहसास होता है कि वाकई मैंने यहां के लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई है। यह मेरे लिए बड़े फख्र और खुशी की बात है।

लोग कहते हैं कि जमाना बदला, गजल बदली, लेकिन गुलाम अली नहीं बदले। क्या आप इस बात से सहमत हैं?

सही है कि वक्त के साथ काफी कुछ बदला। चीजें काफी कॉमर्शलाइज्ड हो गई हैं। लोगों के पास अब वक्त भी कम है लेकिन जहां तक मेरी बात है तो मैं मानता हूं कि हर कलाकार की अपनी अलग शैली होती है। यह सच है कि समय के साथ-साथ गजल में कई तरह के बदलाव आए हैं, लेकिन मुझे लगता है कि ट्रडिशनल तरीके से गजल गाना अब मेरी पहचान बन चुकी है। लोग शायद इसीलिए आज भी मुझे और मेरी गायकी को पसंद करते हैं। ऐसा नहीं है कि मैं गजलों में नए प्रयोग करने के खिलाफ हूं, लेकिन प्रयोग के नाम पर गजल की रूह के साथ छेड़छाड़ करना मुझे पसंद नहीं है। मैं कभी अपना क्लासिकल बेस नहीं छोड़ता।

‘ चुपके-चुपके रात दिन…’ .गाल आपकी पहचान बन चुकी है। इस .गाल में ऐसा क्या है कि लोग आज भी इसे उतना ही पसंद करते हैं?

सच कहा आपने। यह गजल मेरी पहचान बन चुकी है, इसीलिए मेरे लिए बहुत खास है। मेरे स्टेज पर पहुंचते ही लोग इस गजल की फरमाइश शुरू कर देते हैं। दरअसल इस गजल के बोल और इसकी कंपोजिशन इतनी खास है कि हर दौर के लोगों को यह पसंद आती है। मैंने सबसे पहले रेडियो पाकिस्तान पर यह गजल गाई थी और जहां तक मेरा ख्याल है, उसके बाद से मेरी ऐसी कोई परफॉर्मेन्स नहीं रही, जब मैंने यह गजल न गाई हो।

हिंदुस्तानी गजल गायकों के बारे में आपकी क्या राय है?

हिंदुस्तानियों के दिलों में भी गजल का उतना ही खास मुकाम है, जितना पाकिस्तानियों के दिलों में है। यही वजह है कि यहां आज भी गजल की रवायत मौजूद है। तलत अजीज, हरिहरन, पंकज उधास और पीनाज मसानी जैसे कई फनकारों ने इसे सजाया, संवारा और संभाला है। जगजीत सिंह का तो इसमें सबसे खास योगदान रहा है। पाकिस्तान में भी लोग उन्हें चाहते हैं।

उभरते गायकों को आप क्या नसीहत देना चाहेंगे?

मैं सिर्फ यही कहूंगा कि ‘सचाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से, खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से।’ कहने का मतलब यह कि जो लोग लगन और मेहनत से संगीत सीख रहे हैं, वे जरूर आगे बढ़ेंगे। उभरते कलाकारों से मैं यही कहना चाहूंगा कि क्लासिकल का बेस न छोड़ें, क्योंकि वही संगीत का आधार है। अगर गजल की बात करें तो उर्दू की अच्छी समझ भी जरूरी है।

पाकिस्तान और हिंदुस्तान के आपसी रिश्तों के बारे में आपकी क्या राय है?

हमें यह समझना चाहिए कि अगर हम आपस में एक हो जाएं, आपसी समझदारी बढ़ाएं तो फिर दुनिया की कोई ताकत हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। मुझे लगता है कि दोनों मुल्कों के बीच आपसी समझदारी बढ़ रही है, रिश्ते सुधर रहें हैं। रमजान का पाक महीना है और मैं अल्लाह ताला से गुजारिश करता हूं कि इन दोनों मुल्कों में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अमन-चैन कायम रहे।

… और रिश्तों को सुधारने में संगीत की भूमिका!

संगीत हमेशा से सीमाओं से परे रहा है। दोनों मुल्कों के कलाकार एक-दूसरे के यहां खुलकर परफॉर्म कर रहे हैं और खासे पसंद भी किए जा रहे हैं। इससे अवाम में भाईचारा बढ़ता है।

टैलंट हंट प्रोग्रामों खासकर एक कार्यक्रम में हिंदुस्तानी व पाकिस्तानी उभरते कलाकारों के बीच मुकाबले को आप किस रूप में देखते हैं?

यह बहुत ही अच्छा है। पाक से गायकों का चयन मैंने ही किया था। हालांकि इस तरह के प्रोग्राम में कई बार वोटिंग के आधार पर कुछ नाकाबिल लोग भी आगे बढ़ जाते हैं। फिर भी दोनों देशों के लोग इन गायकों को सराह रहे हैं, उनका समर्थन कर रहे हैं, यह बहुत ही अच्छी बात है।

फास्ट म्यूजिक के चलन के बीच गजल का क्या भविष्य नजर आता है?

देखिए, फिल्मों में अच्छा काम करने के बावजूद मैंने ज्यादा काम नहीं किया। फिल्मों में गजल के लिए ज्यादा स्कोप नहीं होता। लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता कि संगीत से संजीदगी घट रही है। मुझे सुनने सिर्फ वही लोग आते हैं, जिन्हें वाकई संगीत की समझ होती है। वैसे, जब तक अच्छे गानेवाले हैं और अच्छे सुनने वाले हैं, गजल को कोई नुकसान नहीं है।

दिल्ली की अवाम को आपका क्या संदेश है?

दिल्ली एक बेहद खूबसूरत और ऐतिहासिक शहर है। यहां के बाशिंदों को मेरा संदेश है कि वे इस विरासत से प्यार करें और इसे संजो कर रखें। गर्मजोशी बनाए रखें और अच्छे गायकी को भी अपने दिल में बसाए रखें।

Source: एनबीटी

मई 7, 2007

"गजल कराती है वास्तविक जिंदगी का एहसास" – जगजीत सिंह

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दुर्गापुर (ब‌र्द्धमान)। एक अर्से बाद रानीगंज आये गजल सम्राट जगजीत सिंह यहां के लोगों के प्रेम और संगीत के प्रति लगाव से गदगद हो गये। एक संगीत कार्यक्रम में भाग लेने आये जगजीत सिंह ने कहा कि आज भी हिन्दी गजल के प्रेमी यहां है। गजल हमें वास्तविक जिंदगी का एहसास करवाती है। दर्द, विरह, वेदना, प्यार आदि सभी लम्हों के संयोग से गजल बनता है। गजल सम्राट जगजीत सिंह दुर्गापुर सिटी सेंटर के सृजनी में महफिल नामक संस्था की ओर से आयोजित गजल संध्या में भाग लेने पहुंचे थे। इस अवसर पर वरिष्ठ माकपा नेता रथीन राय ने कहा कि आज के इस समारोह में आकर मुझे ऐसा लग रहा है कि इस क्षेत्र में भी बदलाव आया है। गजल के प्रति आज भी लोगों में जो दिलचस्पी देखने को मिल रही है उससे लगता है कि भारतीय सभ्यता संस्कृति की जो बुनियाद है उसे कोई हिला नहीं सकता। सभ्य समाज के लिए सभ्य संस्कृति जरूरी है। जो ऐसे कार्यक्रम से मिलती है।