मार्च 1, 2008

अधूरी गजल छोड़ गए फाकिर

Posted in album, गजल, जगजीत सिंह, Bollywood, ghazal, ghazal maestro, ghazals, jagjit, jagjit singh, mehfils, Mirza Ghalib, Nida Fazli tagged , , , , , , , , , , , , , , , at 8:37 पूर्वाह्न द्वारा Amarjeet Singh

माडल टाउन के आर्य समाज मंदिर में एक छोटे से हाल में श्रद्धांजलि देने वाले कुछ खास लोग शामिल हुए। उन्हें देखकर ऐसा लगता नहीं था कि कोई बहुत ही नामी शायर सुदर्शन फाकिर की रस्म पगड़ी में इकट्ठे हुए हैं लोग। समुद्र से गहरे थे फाकिर बड़े ही सादा समारोह में गुलशन कुंदरा ने माइक संभाला और कहा कि वह फाकिर को उन दिनों से जानते हैं जब फाकिर फिल्म इंडस्ट्री के फाकिर नहीं, बल्कि उनके बहुत ही प्यारे दोस्त फाकिर थे। उन्होंने कहा कि वह गहरा समुद्र थे। साहिर की तरह फाकिर हैं जालंधर की पहचान दीपक जालंधरी ने बताया कि अगर लुधियाना की पहचान साहिर लुधियानवी हैं तो जालंधर की पहचान सुदर्शन फाकिर हैं। कुछ लोग अपवाद होते हैं हंस राज हंस ने अपनी बात के शुरू में ही कहा कि सुना है कल रात मर गया वो..लेकिन उन्होंने कहा यह बात फाकिर साहब पर लागू नहीं होती क्योंकि फाकिर जैसे लोग मरते नहीं बल्कि अपने पैरों के निशान छोड़ कर जाते हैं। अपनी कीमत पर जिए फाकिर सुरेश सेठ ने कहा कि फाकिर हर विधा में पारंगत था। इसमें कोई दो राय नहीं कि फाकिर अपनी कीमत पर जिया जिसका उसे कोई मलाल नहीं था। नए कलाकार को देते थे प्रोत्साहन हिंदी फिल्मों के मशहूर गायक सुरेश सहगल ने बताया कि फाकिर साहब की बात ही निराली थी। नए कलाकार को प्रोत्साहन देते थे। समारोह में प्राण शर्मा, मलिक, सतीश भाखड़ी, जानकी दास, प्रिंसिपल वीके तिवाड़ी, राही व कपिला इत्यादि ने भी फाकिर साहब के लिए प्रार्थना की। पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने दुख प्रकट किया। जरा सी आहट पर लगता था जगजीत सिंह आ गए हाल में जरा सी आहट होती थी तो लोगों की निगाह दरवाजे पर चली जाती थी, लेकिन निराशा ही हाथ लगी क्योंकि जगजीत सिंह नहीं पहुंचे। प्रो. एचके गुप्ता जो फिरोजपुर से आए थे ने बताया कि अगर जगजीत आ जाता तो यह फाकिर का नहीं जगजीत का सम्मान था। उनके जिगरी दोस्त विनोद धीर ने बताया कि जब जगजीत सिंह के बेटे की एक हादसे में मृत्यु हो गई और वे टूट गए थे। फाकिर ने टूटे हुए जगजीत सिंह के शरीर में फिर से प्राण फूंक दिए थे। अधूरा रहा किताब छपवाने का सपना फाकिर इतने अच्छे शायर होने के बावजूद अपनी किताब अपने जीते जी नहीं देख सके। इसकी सिसकियां उनके आखिरी दिनों में साफ तौर पर सुनाई देती थीं। शायद यही कारण है कि कैंसर से लंबे समय से जूझते हुए फाकिर ने अपनी पत्नी सुदेश फाकिर से कई बार कहा, ‘मैं अपनी किताब छपवाना चाहता हूं। मैं देखना चाहता हूं जिन गजलों को मैंने अपने बच्चों की तरह पाला-पोसा है वे कैसी हैं।

Source: Jagran

अक्टूबर 12, 2007

कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता..

Posted in chitra singh, ghazal, ghazals, jagjit, jagjit singh, Nida Fazli, singh, Urdu at 7:11 पूर्वाह्न द्वारा Amarjeet Singh

मुंबई। ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता..कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता’। निदा फाजली की गजलों में जिंदगी की कशमकश को काफी शिद्दत से महसूस किया जा सकता है।
फाजली साहब ने जिंदगी के उतार-चढ़ाव तथा जीवन के सभी पहलुओं को शायद बहुत ही करीब से जिया है। यही वजह है कि उनकी शायरी में जिंदगी की कशिश झलकती है।
12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में जन्मे उर्दू साहित्य जगत के अजीम शायर और गीतकार निदा फाजली को शायरी विरासत में मिली। उनके घर में उर्दू और फारसी के दीवान संग्रह भरे पड़े थे। निदा फाजली के वालिद भी शेरो-शायरी में दिलचस्पी रखते थे और उनका अपना काव्य संग्रह भी था। निदा फाजली अक्सर उनके काव्य संग्रह को पढ़ा करते थे। निदा फाजली ने वर्ष 1954 में स्नातकोत्तर की शिक्षा ग्वालियर कालेज से पूरी की। आजादी के बाद उनका पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया, लेकिन निदा फाजली ने हिंदुस्तान में ही रहने का निर्णय लिया। एक दिन निदा फाजली एक मंदिर से गुजर रहे थे तभी उन्हें सूरदास की एक कविता सुनाई पड़ी। इस कविता के माध्यम से राधा और कृष्ण की जुदाई के प्रसंग को दर्शाया गया था। निदा फाजली इस कविता को सुनकर काफी भावुक हो गए और उन्होंने निर्णय लिया कि वह भी एक कवि के रूप में अपनी पहचान बनाएंगे। निदा फाजली मीर और गालिब की रचनाओं से काफी प्रभावित हुए। उन दिनों उर्दू साहित्य के लेखन की एक सीमा निर्धारित थी। धीरे-धीरे उन्होंने उर्दू साहित्य की बंधी-बंधाई सीमाओं को तोड़ दिया और अपने लेखन का अलग अंदाज बनाया। वर्ष 1964 में अपने सपनों को एक नया रूप देने के लिए वह मुंबई आ गए। मुंबई आने के बाद निदा फाजली को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस बीच उन्होंने धर्मयुग और ब्लिट्ज जैसी पत्रिकाओं में लिखना शुरू कर दिया। अपने लेखन की नई शैली की वजह से निदा फाजली कुछ ही समय में लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब हो गए।
इस दौरान उर्दू साहित्य के कुछ प्रगतिशील लेखकों और कवियों की नजर उन पर पड़ी जो उनकी प्रतिभा से काफी प्रभावित हुए थे। निदा फाजली के अंदर उन्हें एक उभरता हुआ कवि दिखाई दिया और उन्होंने उनको प्रोत्साहित करने एवं हरसंभव सहायता देने की पेशकश की और साथ ही उन्हें मुशायरों के कार्यक्रम में आने का न्योता भी दिया।
इस बीच निदा फाजली मुशायरों में भी हिस्सा लेते रहे जिससे उन्हें पूरे देश भर में शोहरत हासिल होने लगी। सत्तर के दशक में मुंबई में अपने बढ़ते खर्चो को देखकर उन्होंने फिल्मों के लिए भी गीत लिखना शुरू कर दिया। लेकिन फिल्मों की विफलता के बाद निदा फाजली को अपना फिल्मी कैरियर डूबता नजर आया, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपना संघर्ष जारी रखा। धीरे-धीरे मुंबई में उनकी पहचान बनती गई। लगभग दस वर्षो तक मायानगरी मुंबई में संघर्ष करने के बाद वर्ष 1980 मे प्रदर्शित फिल्म ‘आप तो ऐसे ना थे’ में अपने गीत ‘तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है ..’ की सफलता के बाद निदा फाजली कुछ हद तक बतौर गीतकार फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। इस फिल्म की सफलता के बाद निदा फाजली को कई फिल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गए। इन फिल्मों में बीबी ओ बीबी, आहिस्ता आहिस्ता, नजराना प्यार का, जैसी फिल्में शामिल हैं। इस बीच उन्होंने कई छोटे बजट की फिल्में भी की।
संगीतकार खय्याम के संगीत निर्देशन में उन्होंने फिल्म आहिस्ता आहिस्ता के लिए ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नही मिलता..’ गीत लिखा। आशा भोंसले और भूपिंदर सिंह की आवाज में अपने इस गीत सफलता के बाद निदा फाजली ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
इस गीत ने पूरे भारत में धूम मचा दी। इसके बाद निदा फाजली ने सफलता की नई बुलंदियों को छुआ और एक से बढ़कर एक गीत लिखे।
वर्ष 1983 निदा फाजली के सिने कैरियर का अहम पड़ाव साबित हुआ। फिल्म रजिया सुल्तान के निर्माण के दौरान गीतकार निसार अख्तर की आकस्मिक मृत्यु के बाद निर्माता कमाल अमरोही ने निदा फाजली से फिल्म के बाकी गीत को लिखने की पेशकश की। गजल सम्राट जगजीत सिंह ने निदा फाजली के लिए कई गीत गाए, जिनमें वर्ष 1999 मे प्रदर्शित फिल्म ‘सरफरोश’ का यह गीत ‘होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है .’ इन दोनों फनकारों की जोड़ी की बेहतरीन मिसाल है। निदा फाजली के काव्य संग्रहों में मोर नाचे, हमकदम और सफर में धूप होगी प्रमुख है।
वर्ष 1998 मे साहित्य जगत मे निदा फाजली के बहुमूल्य योगदान को देखते हुए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा निदा फाजली को खुसरो अवार्ड, महाराष्ट्र उर्दू अकादमी पुरस्कार, हिंदी उर्दू संगम पुरस्कार, मीर तकवी मीर पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
अब तक निदा फाजली द्वारा लिखी 24 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। अपने जीवन के लगभग 69 वसंत देख चुके निदा फाजली आज भी पूरे जोशो-खरोश के साथ साहित्य और फिल्म जगत को सुशोभित कर रहे है।

अगस्त 6, 2007

बहुआयामी विधा के गायक हैं जगजीत – निदा फ़ाज़ली

Posted in A P J Abdul Kalam, album, chitra, chitra singh, ghazal, ghazals, jagjit, jagjit singh, Nida Fazli, singh at 7:27 पूर्वाह्न द्वारा Amarjeet Singh

ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह से मेरी दोस्ती की उम्र उतनी ही है जितनी कि मेरी ग़ज़ल, “दुनिया जिसे कहते हैं, बच्चों का खिलौना है. मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है’’ की.

इस ग़ज़ल को किसी महफिल में जगजीत सिंह ने गाया था और मुझे बिना सूचित किए. उन्होंने इसे चित्रा सिंह के साथ ‘दो गान’ के रूप में रिकॉर्ड कर लिया था.

मुझे इसकी सूचना मिलती भी कैसे, उस समय मेरा पता था, न ठिकाना.

मुझे इसके रिकॉर्ड हो जाने की ख़बर उस वक़्त मिली जब एचएमवी का चेक कई ठिकानों से घूम-फिरकर मुझ तक पहुँचा था.

यह ग़ज़ल उनके एलबम ‘कम अलाइव’ में शामिल है, जो लंदन में उनके एक कॉन्सर्ट की लाइव रिकार्डिंग पर आधारित है.

इस एलबम की शुरूआत जगजीत के बोले हुए जुमलों से होती है. उनकी आवाज़ में जो वाक्य शामिल है वे यूँ है…हम आज शाम की शुरूआत निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल से कर रहे हैं.

इस रिकॉर्ड में मेरे अलावा और भी कई शायरों की रचनाएँ थीं, लेकिन नाम सिर्फ़ मेरा लिया गया था, इसकी वजह से अच्छी-बुरी सारी ग़ज़लों की बदनामी और नेकनामी मेरे खाते में लिख दी गई.

पाकिस्तान के मशहूर शायर अब्दुल हमीद अदम का एक शेर है-

दिल अभी अच्छी तरह टूटा नहीं
दोस्तों की मेहरबानी चाहिए…

गायकी और ग़ज़ल

गायकी और ग़ज़ल का रिश्ता यूँ तो बहुत पुराना है, लेकिन बेग़म अख़्तर और मेहदी हसन का दौर इसकी बुलंदी का जमाना है.

मेहदी हसन की लयकारी ने इस विधा में ऐसे चार चाँद लगाए कि ग़ज़ल गायकी का ए अटूट अंग बन गई.

फ़िल्मी गीतों में शब्दों का अनादर भी सुनने वालों में इसके आदर का कारण बना.

सजे-धजे ड्राइंग रूम्स और फाइव स्टार से लेकर बड़ी-बड़ी महफ़िलों तक हर तरफ़ इसकी गूँज सुनाई देने लगी.

सुरीली गायकी-रागों पर आधारित धुनों और स्तरीय चयन ने बहुत, जल्द मेहदी हसन को एक लीजेंड बना दिया.

वह ग़ज़ल गायकी का एक स्कूल बनकर उभरे और भारत-पाकिस्तान के नए गायक इससे जुड़ते गए और देखते-देखते ग़ज़ल गायकों की गिनती बढ़ती गई.

ग़ज़ल की लोकप्रियता ने क़व्वाली कल्चर को पीछे धकेल दिया.

बड़े-बड़े क़व्वाल या तो घर में खाली बैठ गए या उनमें से अधिकतर ने ग़ज़ल को अपनाना ही मुनासिब समझा.

ग़ज़ल एक काव्य विधा है, प्राचीन भारत के इतिहास में यूँ तो इसके निशानात पहले भी देखे जा सकते हैं, लेकिन हिंदुस्तानी भाषा में पूरे तौर पर इस विधा का दीदार अलाउद्दीन ख़िलज़ी के युग में सूफ़ी निज़ामुद्दीन के आँगन में दिल्ली में होता है.

जहाँ अमीर ख़ुसरो ने उसे देखा और अपनाया. ख़ुसरो फ़ारसी के शायर थे.

हिंदुस्तानी जुबान में उनकी पहली ग़ज़ल, जो उनके नाम से जुड़ी है उसका मुखड़ा यूँ है…

जो यार देखा नैन भर, दिल की गई चिंता उतर
ऐसा नहीं कोई अजब, राखे उसे समझाय कर

यह विधा कई देशों और संस्कृतियों से गुज़र के भारत आई थी, इसीलिए वह एक साथ सूफ़ियाना भी है, रिन्दाना भी है और आशिक़ाना भी है. वह अधर्मी तो नहीं है, लेकिन उसका धर्म मुल्ला-पंडित के दायरों से बाहर होकर ज़मीनों-आसमान के रिश्ते को तलाश करता है.

बहुआयामी गायक

जगजीत सिंह भी इसी बहुआयामी विधा के गायक हैं वह राजस्थान के श्रीगंगानगर में उस्ताद जमाल सेन से संगीत की शिक्षा और जालंधर से कॉलेज की तालीम लेकर बम्बई आए थे.

संगीत से उनकी दोस्ती 1948 के आसपास उन फ़िल्मी गीतों की देन है जो वह घर में रेडियो से सुनते थे और सुनकर गुनगुनाते थे.

सरदार अमर सिंह (जगजीत के पिता) ने उन्हें एक दिन दूर से गाते हुए सुना, और सात बहन-भाइयों के परिवार में एक में वह सपना जागता हुआ देखा, जो कभी उन्होंने अपनी जवानी के दिनों में देखा था और वो पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के कारण अधूरा रह गया था.

अपने अधूरे सपने को, जगजीत सिंह में पूरा करने के लिए वह उन्हें एक ब्लाइंड संगीत शिक्षक प. छगन लाल शर्मा के पास ले गए.

उस समय वह लगभग 12 बरस के थे. उसके बाद वह उस्ताद जमाल खान के शागिर्द हो गए.

गुरू-शिष्य की इस परंपरा के अनुसार जगजीत सिंह का रिश्ता कई पीढ़ियाँ दूर जाकर तानसेन से मिलता है.

तानसेन से मेरा रिश्ता यूँ है, कि मैं जहाँ का हूँ, वहाँ की धरती के एक कोने में इमली की छाँव तले संगीत सम्राट तानसेन का मज़ार है.

जगजीत से मेरी दोस्ती में मेरी ग़ज़लों के अलावा मेरे हमवतन तानसेन घराने से उनके संबंध के रोल से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

भविष्यवाणी

जगजीत सिंह, जगजीत का दूसरा नाम है. पिता ने उनके जन्म पर जो नाम दिया था वह जगमोहन था, लेकिन कुछ वर्षों तक इसी नाम से पुकारे जाने के बाद, एक दिन, परिवार के नामधारी गुरू आए और उनके आदेश से जगमोहन हमेशा के लिए जगजीत बन गए.

नाम की तब्दीली के साथ उनकी भविष्यवाणी थी कि यह जग को जीतेगा…!

इस भविष्यवाणी का चमत्कार उस समय सामने आता नज़र आया जब वह नवीं क्लास के स्टूडेंट थे. अवसर गुरूपर्व का था.

15-20 जाने माने कलाकारों के बीच अपनी बारी पर जब उन्होंने पंजाबी का गीत ‘कि तेरा एतिबार ओर राहिया’ छेड़ा और सारी महफ़िल झूमने लगी, उस स्टेज से उन्हें एक की जगह और भी कई गीत गाने पड़े.

नामों से किस्मत को जोड़ने का फै़शन फ़िल्मी दुनिया में अक्सर नज़र आता है.

कभी-कभी इस तब्दीली का साथ किस्मत ने दिया भी है. यूसुफ़ ख़ान ने दिलीप कुमार होने और इंदौर के बदरुद्दीन के जानी वॉकर होने से उनकी सफलताएँ ज़रूर जुड़ी हुई हैं.

इस पहली सफलता ने युवा जगजीत को भी हमेशा के लिए संगीत से जोड़ दिया. और इस फ़ैसले ने उनका साथ यूँ निभाया कि वह जहाँ भी गए, इसी के द्वारा यश भी पाया, नाम भी कमाया.
मेरा एक शेर है,

कोशिश भी कर, उम्मीद भी रख, रास्ता भी चुन
फिर उसके बाद थोड़ा मुक़द्दर तलाश कर

यह सही है कि सिर्फ़ नाम की तब्दीली से कुछ नहीं होता. नाम के साथ कोशिश, उम्मीद और रास्ते का चयन भी बहुत ज़रूरी है.

जगजीत ने केवल भविष्यवाणी पर भरोसा नहीं किया, ख्वाब को हकीक़त बनाने में लगातार मेहनत से भी काम लिया, उनकी सुबह तानपुरे से शुरू होती है और रात भी रागाभ्यास के साथ सोती है.

इन सुबहों और रातों के बीच उनकी जीवन कथा नए-नए रंग बदलती रही है. उनके संगीत का सफ़र तलत महमूद और मेहदी हसन की गाई हुई ग़ज़लों को दोहराने से प्रारंभ हुआ.

वर्ष 2003 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया

वह जब बम्बई आए थे, तो सर पर पगड़ी और चेहरे पर दाढ़ी थी, बम्बई में जब उनका पहला ईपी बना और उसकी लोकप्रियता देखकर जब एचएमवी ने उनसे कवर पर छापने के लिए तस्वीर माँगी तो उनका चेहरा दाढ़ी से और सर पगड़ी से आज़ाद हो गया.

बिना दाढ़ी और पगड़ी के चेहरे को देखकर मशहूर पत्रकार खुशवंत सिंह को उनके चेहरे में दिलीप कुमार की छवि नज़र आई.

कहते हैं कामयाब मर्द की कामयाबी के पीछे किसी औरत का हाथ होता है. किसी और के साथ यह सच हो न हो, लेकिन जगजीत सिंह के रहन सहन, उनके रिकार्डों के अंग्रेज़ी नाम और स्टेज पर चित्रा सिंह की भागीदारी ने भी जगजीत की इमेज बनाने में ज़रूर विशेष भूमिका निभाई है.

चित्राजी के नाम के साथ सिंह जुड़ने से पहले ‘दत्ता’ लगा हुआ था. चित्रा और दत्ता के मतभेदों ने चित्रा को अकेला कर दिया था. जगजीत सिंह उनके इस एकांत के साथी बने.

उतार-चढाव

जगजीत ने मेरी एक ग़ज़ल गाई है इसका पहला शेर है,

अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख हवाओं का जिधर है उधर के हम है…!

यह ग़ज़ल सैलाब नामक सीरियल में उनकी आवाज़ में थी जो बाद में ‘मिराज़’ में शामिल की गई.

बच्चों का एक खेल है, सांप-सीढ़ी. इसमें एक छोटे से पांसे के सहारे हार-जीत होती है. पांसा कई सीढ़ियाँ चढ़ाता है, और फिर अचानक सांप के फन से उसे डस लिया जाता है.

जगजीत भी चित्रा के साथ कई कामयाबियों के जीने चढ़े, वे जिधर भी बढ़े…आगे और आगे बढ़ते रहे…मगर पांसा तो कुदरत के हाथ का खेल होता है. जगजीत ने ‘इन साइट’ में मेरा एक गीत गाया था,

जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलौना है
दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है.

जगजीत की शख्सियत भी हँसने और रोने के मिलाप का नमूना है. उनके घर पुष्प विला में एक कमरा है. वह कमरा जैसा कई साल पहले था आज भी वैसा ही है. हर सुबह पाबंदी से यह खुलता है और अगरबत्तियों की सुगंध से महकाया जाता है.

उसमें हर चीज़ उसी तरह से रखी है, जैसे कई साल पहले उनका इकलौता बेटा विवेक छोड़ के गया था और फिर कभी नहीं लौटा. भगवान ने जगजीत से विवेक को भले ही छीन लिया हो मगर जगजीत उसे आजतक जीवित रखे हुए हैं. उस कमरे में, अपने गायन में, अपने अंदाज़ में अपनी आवाज़ में.

तुम ये कैसे जुदा हो गए
हर तरफ हर जगह हो गए