नवम्बर 16, 2007

सुनने के नहीं देखने वाले बन रहे हैं गाने

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शंकर साहनी
सिंगर

दरअसल कंपनियां जल्द से जल्द रिस्पॉन्स चाहती हैं, इसलिए सॉफ्ट गानों और लिरिक्स पर ज्यादा ध्यान नहीं देतीं। उन्हें लगता है कि कोई ऐसा गाना लाया जाए, जिससे रातों-रात वारे-न्यारे हो जाएं। अब तो गानों की कहानी दिखाने वाली ज्यादा रह गई है और सुनने वाली कम। यह बदलाव नेगेटिव ही है, क्योंकि गानों में बस ग्लैमर और दिखावा रह गया है। संजीदा अल्फाज और विडियो कंटेंट का होना बहुत जरूरी है। अच्छे गाने तो हमेशा ही पसंद किए जाते रहे हैं। सूफी कलाम से लेकर अब तक जितने भी अच्छे गाने आए, उन्हें कौन भूल पाया है। कुछ अच्छे लिरिक्स वाले गाने भी आजकल आ रहे हैं। जो गाने अच्छे होते हैं, वे चलते ही हैं, रुकते कहां हैं।

और भी संगीत हैं सुनने के लिए

जगजीत सिंह

गजल गायक

वक्त के साथ सब कुछ चेंज होता ही है। लेकिन जो ओरिजिनल और अच्छा होता है, वही सर्वाइव करता है। फिल्मी म्यूजिक में आए बदलाव को ही आप क्यों देखते हैं? सिर्फ वही एक म्यूजिक नहीं है। नॉन फिल्मी म्यूजिक जैसे क्लासिकल, भजन, गजल आदि को देखें, जिसमें पॉजिटिव चेंज आ रहा है। इसमें आया बदलाव उसकी बेहतरी के लिए ही है। फिल्मी म्यूजिक और पॉप ऐल्बम में कुछ लोग पैसे कमाने के चक्कर में वल्गेरिटी डाल रहे हैं। आजकल तो सिंगर खुद ही लिरिक्स लिखने लगे हैं। जिस तरह के लिरिक्स लिखे जा रहे हैं, क्या उनका कोई मतलब है? लेकिन जो लोग ऐसा करते हैं, उनके लिए तो यह चेंज पॉजिटिव ही है।

पता नहीं कहां-कहां से गाएंगे लोग
राजू श्रीवास्तव
हास्य कलाकार

पहले लोग दिल और दिमाग से गाते थे, फिर मुंह से गाने लगे। आजकल नाक से गाने लगे हैं। आगे पता नहीं कहां-कहां से गाएंगे। अब जो गाने बन रहे हैं, उनमें कोई तबला वगैरह तो बजता नहीं है, बस इलेक्ट्रॉनिक इंस्ट्रुमेंट्स का प्रयोग होता है। इन्हें सुनकर ऐसा लगता है, जैसे किसी फैक्ट्री में आ गए हैं, जहां लोग हाथ में हथौड़ी, फावड़ा, आरी लेकर टोपी लगाए हुए इधर-उधर घूम रहे हैं। आजकल की फीमेल सिंगर्स को देखिए कैसे-कैसे गाने गाती हैं, जैसे किसी को डरा रही हों। भूत हूं मैं… भूत हूं!! सुनकर लगता है, मानो सब कब्रें फाड़कर बाहर निकलकर आए हों। कोई खुश नहीं है, सब दुखी होकर गाने गा रहे हैं।

कुछ मीनिंग और मिठास होना जरूरी
पूनम भगत
फैशन डिजाइनर

आजकल जो बेसिरपैर के गाने आ रहे हैं, उनका मतलब मुझे तो समझ नहीं आता। पुराने जमाने में जिस तरह के गाने बनते थे, पता नहीं वैसे गाने अब क्यों नहीं बन रहे हैं। यंगर जेनरेशन को शायद ये गाने पसंद आते हों। गाने में कुछ मीनिंग, उसमें कुछ मिठास भी तो होनी चाहिए। मगर अब यह कम ही गानों में देखने को मिलती है। इन्हें तीन कैटिगरी में बांट सकते हैं। पहला रोमांटिक सॉन्ग, जिनके अच्छे बोल होते हैं, दूसरा जो डिस्को म्यूजिक पर बजते हैं और उनका मतलब समझ नहीं आता। तीसरा इन दोनों के बीच की कैटिगरी वाले गाने। ऐसा नहीं है कि इस बदले हुए दौर में सिर्फ बेहूदा गाने ही बन रहे हैं, इस दौरान ‘परिणीता’ और ‘कभी खुशी कभी गम’ जैसी फिल्मों के अच्छे गाने भी आए हैं।

ट्रेंड का कोई लॉजिक नहीं होता
अयान अली खान

संगीत में आजकल बहुत अच्छा काम हो रहा है। पिछले कुछ सालों के दौरान स्पैनिश, जापानी, लैटिन म्यूजिक का मिश्रण भारतीय संगीत में हुआ है। ग्लोबल कल्चर के इस प्रभाव का फायदा यह हुआ है कि लोगों को हर तरह का संगीत सुनने का मौका मिला है। बॉलिवुड के म्यूजिक में तो बदलाव आया ही है, साथ ही क्लासिकल म्यूजिक भी प्रभावित हुआ है। समय के साथ बदलाव आते ही हैं। गीतकार और आटिर्स्ट के लिए यह क्रिएटिव चेंज है। इसके सही या गलत का फैसला करना ठीक नहीं है। ट्रेंड क्या है, क्या चल रहा है, उसका कोई लॉजिक या फॉर्म्युला नहीं है। फिर भी लोग इसे पसंद कर ही रहे हैं, उनकी सीडी खरीद रहे हैं। सभी आर्टिस्ट अपना बेस्ट आउटपुट देना चाहते हैं, कोई भी जान बूझकर खराब चीज नहीं बनाएगा।

Source: NBT

नवम्बर 14, 2007

उस्ताद गुलाम अली लाइव इन कंसर्ट, सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम, दिल्ली

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उस्ताद गुलाम अली लाइव इन कंसर्ट

स्थान: सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम कॉम्प्लेक्स, अगस्त क्रांति मार्ग, नई दिल्ली
समय: 6:30 PM
फ़ोन: 011-32640810, 9968150101, 9212572703

नवम्बर 13, 2007

..कौन कहता है ¨रदों को खुदा याद नहीं’

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कोटा. गजल सम्राट गुलाम अली का जादू उनके प्रशंसकों के सिर चढ़कर बोलने लगा है। 26 बरस पहले कोटा आए गुलाम अली को सुन चुके उनके प्रशंसकों ने उस gulam aliजमाने की यादों को सहेजना भी शुरू कर दिया है। उनके प्रशंसक कहते हैं कि गुलाम अली को कोटा लाने में प्रसिद्ध कव्वाल युसूफ अली माध्यम बने थे।

गुलाम अली के प्रशंसक तरूमीत सिंह बेदी बताते हैं कि वह 18 जनवरी 1981 की सर्द रात थी, जिसे गुलाम अली की आवाज ने एक यादगार रात बना दिया। बेदी कहते हैं कि गुलाम अली ऐसे गायक हैं जिन्हें कानों से नहीं दिल से सुना जाता है। गुलाम अली के प्रशंसकों में शामिल तत्कालीन विद्युत मंडल में मुख्य अभियंता बीएस झा, डीसीएम के सीएमडी एन सी ब्रrा, जगजीत सिंह बेदी, पारस झांझरी, के एल जोहरी समेत बड़ी संख्या में शहर के प्रबुद्ध नागरिक यहां मौजूद थे।

छोटी बहर की गजल गाने के लिए विख्यात गुलाम अली ने कुछ इस तरह शुरुआत की ‘जाम जब पीता हूं, मुंह से कहता हूं बिस्मिल्लाह, कौन कहता है रिंदों को खुदा याद नहीं’ इसके बाद शुरू हुआ फरमाइशों का दौर जो पूरी रात जारी रह। एक से बढ़कर एक गजल पर श्रोता झूमते रहे। श्रीराम कलामंदिर का परिसर तालियों से गूंज उठा जब फरमाइश पर उन्होंने सुनाया कि ‘कौन समझाए कि क्या रंग है मयखाने का, आंख साकी की उठे नाम हो पैमाने का’। ऐसी ही गजलों को सुनने का एक बार फिर मौका मिलेगा श्रोताओं को 28 अक्टूबर को।

दशहरा मैदान स्थित विजयश्री रंगमंच पर गुलाम अली की गजल संध्या के कार्यक्रम को लेकर व्यापक उत्साह का माहौल है।

प्रोफाइल
* पाकिस्तान के स्यालकोट केलके में 1940 में गुलाम अली का जन्म हुआ।
* पिता गजल गायक व सारंगी वादक थे।गुलाम अली ने 15 बरस की उम्र में गायन सीखना शुरू किया।
* बड़े गुलाम अली से प्रभावित उनके पिता ने नाम ही गुलाम रख दिया।
* 1960 में सबसे पहले लाहौर रेडियो स्टेशन से गजल गायकी की शुरुआत।

नवम्बर 8, 2007

मैं पल दो पल का शायर हूँ…

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वक़्त के साथ हमारी तहज़ीब के चेहरे भी बदलते हैं.

पहले आबादी कम थी, अब ज़्यादा है. बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ बाज़ार भी फैला है. फ़ैलते बाज़ार ने अपने मैयार और संस्कार में तब्दीलियाँ पैदा की हैं.

इन तब्दीलियों में विज्ञान के नए-नए आविष्कारों का भी अपना रोल काम का रहा है. टेलीफ़ोन की सुविधा ने ख़तो-किताबत की रस्म को कम कर दिया, टीवी चैनलों ने पढ़ने को कम करके देखने पर अधिक ज़ोर दिया.

यातायात के तेज़ रफ़्तार साधनों ने किसी दृश्य या नज़ारों से जुड़ने की परंपरा को समाप्त कर दिया. फ़ासलों का आकर्षण नज़दीकियों की बोरियत में ढल रहा है. इस बोरियत ने जीवन के मूल्यों पर हमारे विश्वासों को ही समाप्त नही किया, इस समापन को दर्शन का रूप भी दे दिया.

अस्तित्ववादी सोच ने जीवन में निरंतरता को क्षणिकता में बदल दिया. नस्ल-दर-नस्ल चलने वाला जीवन अब क्षणों का हिसाब-किताब बन गया है.

आज बड़े-बड़े पावन ग्रंथ, जो पहले मानव आचरण में नज़र आते थे, नेताओं की बाज़ारी राजनीति में जगमगाते हैं. इन परिवर्तनों ने हमारी तहज़ीब को जो रूप दिया है उसमें क्रिकेट का बल्ला, फ़िल्म अभिनेता का चेहरा, गायक की आवाज़ और राजनेताओं के अल्फाज़ ही ज़्यादा हावी नज़र आते हैं.

बाज़ार की माया

बाज़ार में जो चीज़ अधिक बिकती है वही हर जगह दिखती है.

पहले ग़ालिब की ग़ज़ल अपने पैरों से चलती थी. निरालाजी की कविता को देश में घूमने-फिरने में किसी सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. कबीर छोटी संगतों से निकलकर आप ही आप बड़ी सोहबतों में पहुँच जाते थे. लेकिन आज मामला दूसरा है. ग़ालिब की गज़ल को जगजीत सिंह की गायकी या नसीरुद्दीन शाह के अभिनय की ज़रूरत पड़ती है और हरिवंश राय बच्चन को याद कराने के लिए अमिताभ बच्चन को सामने आना पड़ता है. क़ैफ़ी आज़मी को मनवाने के लिए शबना आज़मी को अपनी फ़िल्मी शोहरत को काम में लाना पड़ता है.

बच्चन जी के साथ ही नागार्जुन और शिवमंगल सिंह सुमन परलोक सिधारे थे लेकिन सहारा परिवार को अमिताभ के कारण सिर्फ़ बच्चन जी ही याद आए. क़ैफी आजमी के आगे-पीछे उनके कई और महत्वपूर्ण समकालीन ज़िंदगी की लड़ाई हारे थे लेकिन रेल मंत्रालय ने शबाना के कारण क़ैफ़ी की याद में ‘कैफ़ियत’ नाम से ट्रेन चलाई.

सिनेमा के साथ राजनीति का प्रभाव भी साहित्य पर कुछ कम नहीं है. मेरे घर की एक दीवार पर साउथ एशियन साहित्यिक रिकार्डिंग का एक सचित्र बोर्ड लटका है. इसमें भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश की विभिन्न भाषाओं के जाने-माने साहित्यकारों की तस्वीरें हैं. इन सारे साहित्यकारों की आवाज़ में उनकी रचनाओं की रिकार्डिंग अमरीका की एक सांस्कृतिक संस्था ने की थी.

इन साहित्यकारों में सबसे ऊपर की क़तार में अटल बिहारी वाजपेयी विराजमान हैं. यह प्रोजेक्ट उस समय का था जब अटल जी प्रधानमंत्री थे और उनकी परंपरागत कविताएँ, मंचीय होने के बावजूद पाकिस्तान में अनूदित भी हो रही थी और हिंदुस्तान में ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह इन कविताओं की पूरी सोलो सीडी बना रहे थे. उन्हीं दिनों लता मंगेशकर ने एक बयान दिया था. मेरा हमेशा से सपना रहा है कि मैं अटल जी की रचनाएँ गाऊँ. परंतु सपने के हकीक़त बनने की मुद्दत में सरकार बदल गई और फिर लताजी भी अपने सपने को भूल गईं. अटल जी की तरह पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह भी कवि हैं. लेकिन उनके शासनकाल की अवधि थोड़ी कम थी वरना उनकी रचनाओं को गाने के सपने भी कई गायकों की आवाज़ों में साकार हो जाते.

कैफ़ी और जाफ़री

ई-टीवी के उर्दू चैनल पर शबाना ने अपने पिता कैफ़ी आज़मी की याद में एक प्रोग्राम किया था, इसमें कई गायकों ने उनकी ग़ज़ले गाईं. कई अभिनेताओं ने उनके संबंध में अपने विचार व्यक्त किए. उस आयोजन में किसी साहित्यकार को आमंत्रित नहीं किया गया था. इस आयोजन से पहले जुहू के इलाक़े में एक पार्क उनके नाम हो चुका था. इससे पहले उत्तरप्रदेश में एक ट्रेन उनके नाम की जा चुकी थी.

ज्ञानपीठ विजेता सरदार जाफ़री की विधवा सुल्ताना जाफ़री भी इस आयोजन में थीं. वह साहित्य और फ़िल्म के इस गठजोड़ पर अचानक भड़क उठीं और कहा, “भई कैफ़ी अच्छे शायर थे, मगर यह अच्छाई इतनी भी नहीं है कि वह सरदार जैसे बड़े लेखक को छुपा दे.” वे वही सुल्ताना जाफ़री थीं जो सरदार जाफरी की एक मशहूर नज़्म में नज़र आती हैं.

नज़्म का उन्वाव ‘मेरा सफ़र है’ और उस नज़्म का एक हिस्सा यूँ है,

लेकिन मैं यहाँ फिर आऊँगा
और सारा ज़माना देखेगा
हर क़िस्सा मेरा अफ़साना है
हर आशिक़ है सरदार यहाँ
हर माशूक़ा सुल्ताना है

सुल्ताना जाफ़री, सरदार जाफ़री की माशूका बनने से पहले, किसी दूसरे घर की ज़ीनत थीं, लेकिन उनके दिल में अपने ज़माने के मशहूर तरक्की पसंद शायर और तकरीर करने वाले नौजवान सरदार की मुहब्बत थी और इस मुहब्बत ने एक बेटी की माँ को शादी-शुदा शरीअत को अपनी बग़ावत बनाने पर मजबूर कर दिया.

सरदार से उनके दो बेटे हुए, नाज़िम और हिकमत. इन बेटों के नाम सरदार के पसंदीदा शायरों में से एक शायर के एक नाम को दो हिस्सों में बाँट कर रखे गए थे. सरदार हिंदुस्तान के ग़ालिब और कबीर के साथ तुर्की के नाज़िम हिकमत के भी आशिक थे.

सरदार ने बहुत लिखा. उन्होंने कई विधाओं और स्टाइल में लिखा. वह आलोचक भी थे. अच्छे फ़िल्मसाज़ भी थे. प्रभावशाली वक़्ता भी थे और उनके साथ 99 शायरी के संकलनों के शायर भी थे. इनमें ‘परवाज़’ (1944), ‘जम्हूर’ (1946), ‘नई दुनिया को सलाम’ (1947), ‘ख़ूब की लकीर’ (1949), ‘अम्मन का सितारा’ (1950), ‘एशिया जाग उठा’ (1950), ‘पत्थर की दीवार’ (1953), ‘एक ख़्वाब और (1965) पैराहने शरर (1966), ‘लहु पुकारता है’ (1978) हैं.

सरदार अब हमारी दुनिया में नहीं है. लेकिन उन्होंने अपनी नज़्म ‘मेरा सफ़र’ में फ़ारसी के शायर रूमी के एक मिसरे के ज़रीए जीवन की मौत पर विजय की बात कही है.

उन्होंने भी पेशनगोई की थी…लेकिन मैं यहाँ फिर आऊँगा…अगर यह सही है तो मैं उन्हें फिर इस संसार में आने से पहले एक मशवरा ज़रूर देना चाहूँगा. वह इस संसार में इस बार आएँ तो अपने बेटों को तुर्की के शायर नाम देने के बजाए फ़िल्म एक्टरों या क्रिकेटरों के नामों में से नाम चुनें, नहीं तो बाज़ार की तराज़ू में उनका सही वज़न नहीं नापा जाएगा.

यह हक़ीक़त है कि सन् 1935-36 में शायरों की जो नस्ल टैगौर, फिराक़, प्रेमचंद्र या और जोश की वारिस बन कर आई थी, उसमें अपनी शैली शब्दावली और विचारों के लिहाज़ से दो नाम ही रौशन नज़र आते हैं. इनमें एक फ़ैज़ थे दूसरे सरदार जाफ़री थे.

जाफ़री की शायरी की भाषा का बड़ा हिस्सा ईरान के उस असर से आज़ाद है, जिससे उर्दू शायरी का बड़ा हिस्सा बोझिल है, उनके यहाँ ऐसी पंक्तियाँ जैसे, ‘गाय के थन से निकलती है चमकती चाँदी’, ‘धुएँ से काले तवे भी चिंगारियों के होठो से हँस रहे हैं’ या ‘इमलियों के पत्तों पर धूप पर सुखाती है’ आदि शायरी में नए लहजे की पहचान कराते हैं.

सरदार के तो दो बेटे थे. साहिर ने तो कालेज के दिनों में हुए इश्क के ग़म में शादी ही नहीं की. उनकी आख़िरी किताब ‘आओ कि ख़्वाब बुनें’ में एक नज़्म अमृता प्रीतम के नाम भी है. साहिर की विरासत में सिवाए ‘परछाइयाँ’ नाम की एक इमारत के कोई नहीं है. यह इमारत भी अब हुकूमत के सुपुर्द है. अगर उनके वारिसों में कोई एक्टर या एक्ट्रेस होते तो उनकी क़ब्र बम्बई के क़ब्रिस्तान में निशान से बेनिशान नहीं होती.

मैं पल दो पल का शायर हूँ. पल दो पल मेरा फ़साना है.

अक्टूबर 13, 2007

गजल की रूह से छेड़छाड़ करना पसंद नहीं : गुलाम अली

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गजल की बात चले और गुलाम अली का जिक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। उनके जितने फैन उनकी सरजमीं पाकिस्तान में हैं, उससे कई गुना हिंदुस्तान और दुनिया भर में। आज शाम राजधानी की ऐतिहासिक धरोहर कुतुब मीनार पर गुलाम अली की गजलें फिर गूंजेंगी। नवभारत टाइम्स द्वारा आयोजित गजलों की इस खास शाम में प्रस्तुति देने के लिए खासतौर से दिल्ली आए गजलों की दुनिया के बेताज बादशाह .गुलाम अली से हमारी संवाददाता प्रियंका सिंह और प्रशांत सोनी ने खास मुलाकात की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश :

दिल्ली आपके दिल के कितने करीब है?

दिल्ली तो दिलवालों का शहर है। इसके बारे में जितना कहा जाए, कम है। यहां का खाना, मौसम, अवाम, ऐतिहासिक जगहें, हरियाली, सब कुछ मुझे पसंद है। दिल्ली मेरे भी दिल के उतने ही करीब है, जितनी आपके या किसी और के। यहां परफॉर्म करना मुझे अच्छा लगता है। वैसे दिल्ली कई मायनों में लाहौर से काफी मिलती-जुलती है।

इसी साल मार्च के महीने में पुराने किले में आपकी गजलें गूंजी थी। अब कुतुब मीनार के साये में गाएंगे। हिंदुस्तान की इन ऐतिहासिक धरोहरों के समीप प्रस्तुति देना आपके लिए कितना खास है?

इन जगहों पर प्रस्तुति देना वाकई मेरे लिए बहुत खास है। आगरे का ताजमहल हो या बनारस के घाट, या फिर दिल्ली का पुराना किला और कुतुब मीनार, जब मैं इन जगहों पर गाता हूं, तो मुझे अहसास होता है कि मैं एक ऐसी जगह पर गा रहा हूं, जिसका ऐतिहासिक महत्व है। इन जगहों का पारंपरिक माहौल गजल की पुरानी रवायत के करीब नजर आता है। वैसे मेरी गायकी भी काफी पारंपरिक है।

हिंदुस्तान में परफॉर्म करना आपको कैसा लगता है?

यहां आकर परफॉर्म करना मेरे लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के हर कलाकार के लिए खास महत्व रखता है। यहां सुननेवालों से हर कलाकार को जैसी मुहब्बत और इज्जत मिलती है, वैसी दुनिया में और कहीं नहीं मिलती। यहां के लोगों का प्यार ही है, जो हर बार मुझे यहां खींच लाता है। यहां मेरे हर कार्यक्रम में जिस तरह भीड़ उमड़ती है, उसे देखकर अहसास होता है कि वाकई मैंने यहां के लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई है। यह मेरे लिए बड़े फख्र और खुशी की बात है।

लोग कहते हैं कि जमाना बदला, गजल बदली, लेकिन गुलाम अली नहीं बदले। क्या आप इस बात से सहमत हैं?

सही है कि वक्त के साथ काफी कुछ बदला। चीजें काफी कॉमर्शलाइज्ड हो गई हैं। लोगों के पास अब वक्त भी कम है लेकिन जहां तक मेरी बात है तो मैं मानता हूं कि हर कलाकार की अपनी अलग शैली होती है। यह सच है कि समय के साथ-साथ गजल में कई तरह के बदलाव आए हैं, लेकिन मुझे लगता है कि ट्रडिशनल तरीके से गजल गाना अब मेरी पहचान बन चुकी है। लोग शायद इसीलिए आज भी मुझे और मेरी गायकी को पसंद करते हैं। ऐसा नहीं है कि मैं गजलों में नए प्रयोग करने के खिलाफ हूं, लेकिन प्रयोग के नाम पर गजल की रूह के साथ छेड़छाड़ करना मुझे पसंद नहीं है। मैं कभी अपना क्लासिकल बेस नहीं छोड़ता।

‘ चुपके-चुपके रात दिन…’ .गाल आपकी पहचान बन चुकी है। इस .गाल में ऐसा क्या है कि लोग आज भी इसे उतना ही पसंद करते हैं?

सच कहा आपने। यह गजल मेरी पहचान बन चुकी है, इसीलिए मेरे लिए बहुत खास है। मेरे स्टेज पर पहुंचते ही लोग इस गजल की फरमाइश शुरू कर देते हैं। दरअसल इस गजल के बोल और इसकी कंपोजिशन इतनी खास है कि हर दौर के लोगों को यह पसंद आती है। मैंने सबसे पहले रेडियो पाकिस्तान पर यह गजल गाई थी और जहां तक मेरा ख्याल है, उसके बाद से मेरी ऐसी कोई परफॉर्मेन्स नहीं रही, जब मैंने यह गजल न गाई हो।

हिंदुस्तानी गजल गायकों के बारे में आपकी क्या राय है?

हिंदुस्तानियों के दिलों में भी गजल का उतना ही खास मुकाम है, जितना पाकिस्तानियों के दिलों में है। यही वजह है कि यहां आज भी गजल की रवायत मौजूद है। तलत अजीज, हरिहरन, पंकज उधास और पीनाज मसानी जैसे कई फनकारों ने इसे सजाया, संवारा और संभाला है। जगजीत सिंह का तो इसमें सबसे खास योगदान रहा है। पाकिस्तान में भी लोग उन्हें चाहते हैं।

उभरते गायकों को आप क्या नसीहत देना चाहेंगे?

मैं सिर्फ यही कहूंगा कि ‘सचाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से, खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से।’ कहने का मतलब यह कि जो लोग लगन और मेहनत से संगीत सीख रहे हैं, वे जरूर आगे बढ़ेंगे। उभरते कलाकारों से मैं यही कहना चाहूंगा कि क्लासिकल का बेस न छोड़ें, क्योंकि वही संगीत का आधार है। अगर गजल की बात करें तो उर्दू की अच्छी समझ भी जरूरी है।

पाकिस्तान और हिंदुस्तान के आपसी रिश्तों के बारे में आपकी क्या राय है?

हमें यह समझना चाहिए कि अगर हम आपस में एक हो जाएं, आपसी समझदारी बढ़ाएं तो फिर दुनिया की कोई ताकत हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। मुझे लगता है कि दोनों मुल्कों के बीच आपसी समझदारी बढ़ रही है, रिश्ते सुधर रहें हैं। रमजान का पाक महीना है और मैं अल्लाह ताला से गुजारिश करता हूं कि इन दोनों मुल्कों में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अमन-चैन कायम रहे।

… और रिश्तों को सुधारने में संगीत की भूमिका!

संगीत हमेशा से सीमाओं से परे रहा है। दोनों मुल्कों के कलाकार एक-दूसरे के यहां खुलकर परफॉर्म कर रहे हैं और खासे पसंद भी किए जा रहे हैं। इससे अवाम में भाईचारा बढ़ता है।

टैलंट हंट प्रोग्रामों खासकर एक कार्यक्रम में हिंदुस्तानी व पाकिस्तानी उभरते कलाकारों के बीच मुकाबले को आप किस रूप में देखते हैं?

यह बहुत ही अच्छा है। पाक से गायकों का चयन मैंने ही किया था। हालांकि इस तरह के प्रोग्राम में कई बार वोटिंग के आधार पर कुछ नाकाबिल लोग भी आगे बढ़ जाते हैं। फिर भी दोनों देशों के लोग इन गायकों को सराह रहे हैं, उनका समर्थन कर रहे हैं, यह बहुत ही अच्छी बात है।

फास्ट म्यूजिक के चलन के बीच गजल का क्या भविष्य नजर आता है?

देखिए, फिल्मों में अच्छा काम करने के बावजूद मैंने ज्यादा काम नहीं किया। फिल्मों में गजल के लिए ज्यादा स्कोप नहीं होता। लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता कि संगीत से संजीदगी घट रही है। मुझे सुनने सिर्फ वही लोग आते हैं, जिन्हें वाकई संगीत की समझ होती है। वैसे, जब तक अच्छे गानेवाले हैं और अच्छे सुनने वाले हैं, गजल को कोई नुकसान नहीं है।

दिल्ली की अवाम को आपका क्या संदेश है?

दिल्ली एक बेहद खूबसूरत और ऐतिहासिक शहर है। यहां के बाशिंदों को मेरा संदेश है कि वे इस विरासत से प्यार करें और इसे संजो कर रखें। गर्मजोशी बनाए रखें और अच्छे गायकी को भी अपने दिल में बसाए रखें।

Source: एनबीटी

अक्टूबर 12, 2007

कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता..

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मुंबई। ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता..कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता’। निदा फाजली की गजलों में जिंदगी की कशमकश को काफी शिद्दत से महसूस किया जा सकता है।
फाजली साहब ने जिंदगी के उतार-चढ़ाव तथा जीवन के सभी पहलुओं को शायद बहुत ही करीब से जिया है। यही वजह है कि उनकी शायरी में जिंदगी की कशिश झलकती है।
12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में जन्मे उर्दू साहित्य जगत के अजीम शायर और गीतकार निदा फाजली को शायरी विरासत में मिली। उनके घर में उर्दू और फारसी के दीवान संग्रह भरे पड़े थे। निदा फाजली के वालिद भी शेरो-शायरी में दिलचस्पी रखते थे और उनका अपना काव्य संग्रह भी था। निदा फाजली अक्सर उनके काव्य संग्रह को पढ़ा करते थे। निदा फाजली ने वर्ष 1954 में स्नातकोत्तर की शिक्षा ग्वालियर कालेज से पूरी की। आजादी के बाद उनका पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया, लेकिन निदा फाजली ने हिंदुस्तान में ही रहने का निर्णय लिया। एक दिन निदा फाजली एक मंदिर से गुजर रहे थे तभी उन्हें सूरदास की एक कविता सुनाई पड़ी। इस कविता के माध्यम से राधा और कृष्ण की जुदाई के प्रसंग को दर्शाया गया था। निदा फाजली इस कविता को सुनकर काफी भावुक हो गए और उन्होंने निर्णय लिया कि वह भी एक कवि के रूप में अपनी पहचान बनाएंगे। निदा फाजली मीर और गालिब की रचनाओं से काफी प्रभावित हुए। उन दिनों उर्दू साहित्य के लेखन की एक सीमा निर्धारित थी। धीरे-धीरे उन्होंने उर्दू साहित्य की बंधी-बंधाई सीमाओं को तोड़ दिया और अपने लेखन का अलग अंदाज बनाया। वर्ष 1964 में अपने सपनों को एक नया रूप देने के लिए वह मुंबई आ गए। मुंबई आने के बाद निदा फाजली को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस बीच उन्होंने धर्मयुग और ब्लिट्ज जैसी पत्रिकाओं में लिखना शुरू कर दिया। अपने लेखन की नई शैली की वजह से निदा फाजली कुछ ही समय में लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब हो गए।
इस दौरान उर्दू साहित्य के कुछ प्रगतिशील लेखकों और कवियों की नजर उन पर पड़ी जो उनकी प्रतिभा से काफी प्रभावित हुए थे। निदा फाजली के अंदर उन्हें एक उभरता हुआ कवि दिखाई दिया और उन्होंने उनको प्रोत्साहित करने एवं हरसंभव सहायता देने की पेशकश की और साथ ही उन्हें मुशायरों के कार्यक्रम में आने का न्योता भी दिया।
इस बीच निदा फाजली मुशायरों में भी हिस्सा लेते रहे जिससे उन्हें पूरे देश भर में शोहरत हासिल होने लगी। सत्तर के दशक में मुंबई में अपने बढ़ते खर्चो को देखकर उन्होंने फिल्मों के लिए भी गीत लिखना शुरू कर दिया। लेकिन फिल्मों की विफलता के बाद निदा फाजली को अपना फिल्मी कैरियर डूबता नजर आया, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपना संघर्ष जारी रखा। धीरे-धीरे मुंबई में उनकी पहचान बनती गई। लगभग दस वर्षो तक मायानगरी मुंबई में संघर्ष करने के बाद वर्ष 1980 मे प्रदर्शित फिल्म ‘आप तो ऐसे ना थे’ में अपने गीत ‘तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है ..’ की सफलता के बाद निदा फाजली कुछ हद तक बतौर गीतकार फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। इस फिल्म की सफलता के बाद निदा फाजली को कई फिल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गए। इन फिल्मों में बीबी ओ बीबी, आहिस्ता आहिस्ता, नजराना प्यार का, जैसी फिल्में शामिल हैं। इस बीच उन्होंने कई छोटे बजट की फिल्में भी की।
संगीतकार खय्याम के संगीत निर्देशन में उन्होंने फिल्म आहिस्ता आहिस्ता के लिए ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नही मिलता..’ गीत लिखा। आशा भोंसले और भूपिंदर सिंह की आवाज में अपने इस गीत सफलता के बाद निदा फाजली ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
इस गीत ने पूरे भारत में धूम मचा दी। इसके बाद निदा फाजली ने सफलता की नई बुलंदियों को छुआ और एक से बढ़कर एक गीत लिखे।
वर्ष 1983 निदा फाजली के सिने कैरियर का अहम पड़ाव साबित हुआ। फिल्म रजिया सुल्तान के निर्माण के दौरान गीतकार निसार अख्तर की आकस्मिक मृत्यु के बाद निर्माता कमाल अमरोही ने निदा फाजली से फिल्म के बाकी गीत को लिखने की पेशकश की। गजल सम्राट जगजीत सिंह ने निदा फाजली के लिए कई गीत गाए, जिनमें वर्ष 1999 मे प्रदर्शित फिल्म ‘सरफरोश’ का यह गीत ‘होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है .’ इन दोनों फनकारों की जोड़ी की बेहतरीन मिसाल है। निदा फाजली के काव्य संग्रहों में मोर नाचे, हमकदम और सफर में धूप होगी प्रमुख है।
वर्ष 1998 मे साहित्य जगत मे निदा फाजली के बहुमूल्य योगदान को देखते हुए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा निदा फाजली को खुसरो अवार्ड, महाराष्ट्र उर्दू अकादमी पुरस्कार, हिंदी उर्दू संगम पुरस्कार, मीर तकवी मीर पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
अब तक निदा फाजली द्वारा लिखी 24 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। अपने जीवन के लगभग 69 वसंत देख चुके निदा फाजली आज भी पूरे जोशो-खरोश के साथ साहित्य और फिल्म जगत को सुशोभित कर रहे है।

जगजीत सिंह की हालत स्थिर

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मुंबई। गजल गायक जगजीत सिंह की हालत स्थिर बनी हुई है और उन्हे लकवा हमले की कोई शिकायत नहीं है। यहां बॉम्बे अस्पताल के डॉक्टरों ने मंगलवार को एक टीवी समाचार चैनल पर दिखाई गई खबर को खारिज करते हुए यह बात कही। डॉक्टरों ने कहा कि सिर में दर्द और कमजोरी की शिकायत पर उन्हे अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
बॉम्बे अस्पताल के प्रवक्ता आशीष तिवारी ने बातचीत में कहा कि सिंह को सोमवार को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उन्हे गहन चिकित्सा कक्ष में रखा गया, जहां डॉक्टरों ने उनका परीक्षण किया और कुछ टेस्ट कराए गए। उन पर लकवा के हमले का कोई लक्षण नहीं मिला है। तिवारी ने कहा कि 66 वर्षीय गजल गायक को उनकी पत्नीे सोमवार को अस्पताल लेकर आई। उन्हे कमजोरी और सिर में दर्द की शिकायत थी। तिवारी के मुताबिक जगजीत सिंह की हालत स्थिर बनी हुई है और उन्हे मंगलवार को निजी वार्ड में स्थानांतरित कर दिया गया। सिंह जिन्हे देश के शीर्ष गजल गायकों में से एक के रूप में पहचान मिली हुई है, ने 24 सितंबर को अपना हालिया एलबम ‘करूण’ को यहां के इस्कॉन मंदिर में लांच किया था।
निजी एलबम बनाने के अलावा जगजीत सिंह ने कई फिल्मों के लिए गजल भी गाए भी है। उनकी कुछ यादगार गजलें है- ‘हाथों से छू लू तुम, मेरा गीत अमर कर दो’, ‘झुकी-झुकी सी नजर’, ‘तुमको देखा तो’, और ‘तुम इतना जो मुस्करा रहे हो’ है। जगजीत सिंह ने अपनी पत्नी चित्रा के साथ मिलकर देश में गजल गायन की परंपरा को एक नया अंदाज दिया है। लेकिन चित्रा ने अपने बेटे विवेक की एक दर्दनाक कार हादसे में मौत के बाद गजल गाना छोड़ दिया था।

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