मार्च 1, 2008

अधूरी गजल छोड़ गए फाकिर

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माडल टाउन के आर्य समाज मंदिर में एक छोटे से हाल में श्रद्धांजलि देने वाले कुछ खास लोग शामिल हुए। उन्हें देखकर ऐसा लगता नहीं था कि कोई बहुत ही नामी शायर सुदर्शन फाकिर की रस्म पगड़ी में इकट्ठे हुए हैं लोग। समुद्र से गहरे थे फाकिर बड़े ही सादा समारोह में गुलशन कुंदरा ने माइक संभाला और कहा कि वह फाकिर को उन दिनों से जानते हैं जब फाकिर फिल्म इंडस्ट्री के फाकिर नहीं, बल्कि उनके बहुत ही प्यारे दोस्त फाकिर थे। उन्होंने कहा कि वह गहरा समुद्र थे। साहिर की तरह फाकिर हैं जालंधर की पहचान दीपक जालंधरी ने बताया कि अगर लुधियाना की पहचान साहिर लुधियानवी हैं तो जालंधर की पहचान सुदर्शन फाकिर हैं। कुछ लोग अपवाद होते हैं हंस राज हंस ने अपनी बात के शुरू में ही कहा कि सुना है कल रात मर गया वो..लेकिन उन्होंने कहा यह बात फाकिर साहब पर लागू नहीं होती क्योंकि फाकिर जैसे लोग मरते नहीं बल्कि अपने पैरों के निशान छोड़ कर जाते हैं। अपनी कीमत पर जिए फाकिर सुरेश सेठ ने कहा कि फाकिर हर विधा में पारंगत था। इसमें कोई दो राय नहीं कि फाकिर अपनी कीमत पर जिया जिसका उसे कोई मलाल नहीं था। नए कलाकार को देते थे प्रोत्साहन हिंदी फिल्मों के मशहूर गायक सुरेश सहगल ने बताया कि फाकिर साहब की बात ही निराली थी। नए कलाकार को प्रोत्साहन देते थे। समारोह में प्राण शर्मा, मलिक, सतीश भाखड़ी, जानकी दास, प्रिंसिपल वीके तिवाड़ी, राही व कपिला इत्यादि ने भी फाकिर साहब के लिए प्रार्थना की। पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने दुख प्रकट किया। जरा सी आहट पर लगता था जगजीत सिंह आ गए हाल में जरा सी आहट होती थी तो लोगों की निगाह दरवाजे पर चली जाती थी, लेकिन निराशा ही हाथ लगी क्योंकि जगजीत सिंह नहीं पहुंचे। प्रो. एचके गुप्ता जो फिरोजपुर से आए थे ने बताया कि अगर जगजीत आ जाता तो यह फाकिर का नहीं जगजीत का सम्मान था। उनके जिगरी दोस्त विनोद धीर ने बताया कि जब जगजीत सिंह के बेटे की एक हादसे में मृत्यु हो गई और वे टूट गए थे। फाकिर ने टूटे हुए जगजीत सिंह के शरीर में फिर से प्राण फूंक दिए थे। अधूरा रहा किताब छपवाने का सपना फाकिर इतने अच्छे शायर होने के बावजूद अपनी किताब अपने जीते जी नहीं देख सके। इसकी सिसकियां उनके आखिरी दिनों में साफ तौर पर सुनाई देती थीं। शायद यही कारण है कि कैंसर से लंबे समय से जूझते हुए फाकिर ने अपनी पत्नी सुदेश फाकिर से कई बार कहा, ‘मैं अपनी किताब छपवाना चाहता हूं। मैं देखना चाहता हूं जिन गजलों को मैंने अपने बच्चों की तरह पाला-पोसा है वे कैसी हैं।

Source: Jagran

फ़रवरी 21, 2008

चलती राहो में यूं ही आंख लगी है फाकिर

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फाकिरवो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.. हे राम. व आदमी आदमी को क्या देगा जो भी देगा खुदा देगा.. जैसी कालजयी गजलें लिखने वाले मशहूर शायर सुदर्शन फाकिर सोमवार को इस दुनिया से रुखसत हो लिए। अफसोस कि पंजाब को एक अलग पहचान देने वाले इस शख्स को पंजाबियों और पंजाब ने नहीं पहचाना।

वर्ष 1937 में फिरोजपुर के गुरुहरसहाय कस्बे के रत्ताखेड़ा गांव में डाक्टर बिहारी लाल कामरा के यहां जन्म लेने वाले सुदर्शन फाकिर के परिवार में दो अन्य भाई भी थे। बड़े भाई का देहांत हो चुका है। जालंधर में रहने वाले छोटे भाई विनोद कामरा के यहां फाकिर साहब ने जिंदगी के आखिरी लम्हे बिताए।

फाकिर साहब के अजीज मित्रों कहना है कि उनकी याददाश्त काफी तेज थी। जिस शख्स से वह मिल लेते थे, उसे दोबारा अपना नाम नहीं बताना पड़ता था। यह अलग बात है कि फाकिर साहब को उनके घर का पता कभी याद नहीं रहा। वर्ष 1970 से पहले जालंधर में आल इंडिया रेडियो में नौकरी करने वाले फाकिर साहब को वहां मन नहीं लगा। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और मुंबई चले आए। 2005 में वह मुंबई से वापस आकर जालंधर में अपने छोटे भाई के यहां रहने लगे। सत्तर के करीब गजल लिखने वाले फाकिर की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन दिनों बेगम अख्तर सिर्फ पाकिस्तान के शायरों की गजल ही गाया करती थीं। मगर, फाकिर साहब पहले भारतीय शायर हैं, जिनकी लिखी गजल बेगम अख्तर ने बुलाकर ली और अपनी आवाज दी। वह मशहूर गजल थी ‘इश्क में गैरते जज्बात नेरोने न दिया..’। बाद में चित्रा सिंह ने भी इसे गाया था।

मोहम्मद रफी ने उनकी गजल ‘फलसफे इश्क में पेश आए हैं सवालों की तरह..’ गाकर दुनिया में धूम मचा दी। इस नज्म ने फाकिर को नई पहचान दी। जब गजल गायक जगजीत सिंह ने उनके द्वारा लिखी गजल ‘वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.’ गाया उसके बाद फाकिर केनाम का डंका दुनिया में ऐसा गूंजा कि उसकी खनक आज भी सुनाई देती है। उनके द्वारा लिखित गजल ‘जिंदगी मेरे घर आना..’ गाकर भूपिंदर सिंह ने फिल्म फेयर अवार्ड जीता। वहीं गुलाम अली ने ‘कैसे लिखोगे मोहब्बत की किताब तुम तो करने लगे पल-पल का हिसाब..’ गाकर गजलों के इस सम्राट को सलाम किया था। फाकिर का अंतिम शेर जो दुनिया के सामने नहीं आ सका, वह था ‘लाश मासूम की हो या कि कातिल की, जनाब हमने अफसोस किया है..’। वर्ष 1982 में गजल की एक कैसेट रिलीज की गई थी, उसमें मीरा व कबीर के सात भजन थे और आठवां भजन फाकिर साहब ने लिखा था। वहीं फाकिर साहिब का एक गीत ‘आखिर तुम्हें आना है जरा देर लगेगी..’ भी काफी पसंद किया गया था। इसका बालीवुड फिल्म यलगार के लिए इस्तेमाल किया गया था।

Source: Jagran

नवम्बर 19, 2007

एयरपोर्ट पर जगजीत की झलक को मची होड़

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Nov 18, 01:21 am
पटना। राजधानी में कार्यक्रम के सिलसिले में पहुंचे जगजीत की एक झलक को एयरपोर्ट पर शनिवार को जबदरस्त होड़ मची। परिसर से बाहर आते ही प्रशंसकों ने उनका जबदरस्त स्वागत किया।

अपनी मखमली आवाज के लिए जाने जाने वाले गजल गायक जगजीत सिंह के प्रशंसकों की राजधानी में भी कोई कमी नहीं है। कार्यक्रम के सिलसिले में इंडियन एयरलाइंस की उड़ान से अपराह्न चार बजे के आसपास मुंबई से पटना पहुंचे जगजीत सिंह को प्रशंसकों ने परिसर के भीतर आगमन हाल में ही घेर लिया। बकायदा गुलदस्ता देकर उनका विधिवत स्वागत किया गया। जगजीत सिंह के पहुंचने की खबर मिलते ही लोग उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़े। उनकी एक झलक पाकर एयरपोर्ट के कर्मचारियों से लेकर विमान यात्री तक काफी रोमांचित दिखे। परिसर के बाहर भी उनके प्रशंसकों की बड़ी तादाद मौजूद थी।

Source: Jagran

नवम्बर 16, 2007

सुनने के नहीं देखने वाले बन रहे हैं गाने

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शंकर साहनी
सिंगर

दरअसल कंपनियां जल्द से जल्द रिस्पॉन्स चाहती हैं, इसलिए सॉफ्ट गानों और लिरिक्स पर ज्यादा ध्यान नहीं देतीं। उन्हें लगता है कि कोई ऐसा गाना लाया जाए, जिससे रातों-रात वारे-न्यारे हो जाएं। अब तो गानों की कहानी दिखाने वाली ज्यादा रह गई है और सुनने वाली कम। यह बदलाव नेगेटिव ही है, क्योंकि गानों में बस ग्लैमर और दिखावा रह गया है। संजीदा अल्फाज और विडियो कंटेंट का होना बहुत जरूरी है। अच्छे गाने तो हमेशा ही पसंद किए जाते रहे हैं। सूफी कलाम से लेकर अब तक जितने भी अच्छे गाने आए, उन्हें कौन भूल पाया है। कुछ अच्छे लिरिक्स वाले गाने भी आजकल आ रहे हैं। जो गाने अच्छे होते हैं, वे चलते ही हैं, रुकते कहां हैं।

और भी संगीत हैं सुनने के लिए

जगजीत सिंह

गजल गायक

वक्त के साथ सब कुछ चेंज होता ही है। लेकिन जो ओरिजिनल और अच्छा होता है, वही सर्वाइव करता है। फिल्मी म्यूजिक में आए बदलाव को ही आप क्यों देखते हैं? सिर्फ वही एक म्यूजिक नहीं है। नॉन फिल्मी म्यूजिक जैसे क्लासिकल, भजन, गजल आदि को देखें, जिसमें पॉजिटिव चेंज आ रहा है। इसमें आया बदलाव उसकी बेहतरी के लिए ही है। फिल्मी म्यूजिक और पॉप ऐल्बम में कुछ लोग पैसे कमाने के चक्कर में वल्गेरिटी डाल रहे हैं। आजकल तो सिंगर खुद ही लिरिक्स लिखने लगे हैं। जिस तरह के लिरिक्स लिखे जा रहे हैं, क्या उनका कोई मतलब है? लेकिन जो लोग ऐसा करते हैं, उनके लिए तो यह चेंज पॉजिटिव ही है।

पता नहीं कहां-कहां से गाएंगे लोग
राजू श्रीवास्तव
हास्य कलाकार

पहले लोग दिल और दिमाग से गाते थे, फिर मुंह से गाने लगे। आजकल नाक से गाने लगे हैं। आगे पता नहीं कहां-कहां से गाएंगे। अब जो गाने बन रहे हैं, उनमें कोई तबला वगैरह तो बजता नहीं है, बस इलेक्ट्रॉनिक इंस्ट्रुमेंट्स का प्रयोग होता है। इन्हें सुनकर ऐसा लगता है, जैसे किसी फैक्ट्री में आ गए हैं, जहां लोग हाथ में हथौड़ी, फावड़ा, आरी लेकर टोपी लगाए हुए इधर-उधर घूम रहे हैं। आजकल की फीमेल सिंगर्स को देखिए कैसे-कैसे गाने गाती हैं, जैसे किसी को डरा रही हों। भूत हूं मैं… भूत हूं!! सुनकर लगता है, मानो सब कब्रें फाड़कर बाहर निकलकर आए हों। कोई खुश नहीं है, सब दुखी होकर गाने गा रहे हैं।

कुछ मीनिंग और मिठास होना जरूरी
पूनम भगत
फैशन डिजाइनर

आजकल जो बेसिरपैर के गाने आ रहे हैं, उनका मतलब मुझे तो समझ नहीं आता। पुराने जमाने में जिस तरह के गाने बनते थे, पता नहीं वैसे गाने अब क्यों नहीं बन रहे हैं। यंगर जेनरेशन को शायद ये गाने पसंद आते हों। गाने में कुछ मीनिंग, उसमें कुछ मिठास भी तो होनी चाहिए। मगर अब यह कम ही गानों में देखने को मिलती है। इन्हें तीन कैटिगरी में बांट सकते हैं। पहला रोमांटिक सॉन्ग, जिनके अच्छे बोल होते हैं, दूसरा जो डिस्को म्यूजिक पर बजते हैं और उनका मतलब समझ नहीं आता। तीसरा इन दोनों के बीच की कैटिगरी वाले गाने। ऐसा नहीं है कि इस बदले हुए दौर में सिर्फ बेहूदा गाने ही बन रहे हैं, इस दौरान ‘परिणीता’ और ‘कभी खुशी कभी गम’ जैसी फिल्मों के अच्छे गाने भी आए हैं।

ट्रेंड का कोई लॉजिक नहीं होता
अयान अली खान

संगीत में आजकल बहुत अच्छा काम हो रहा है। पिछले कुछ सालों के दौरान स्पैनिश, जापानी, लैटिन म्यूजिक का मिश्रण भारतीय संगीत में हुआ है। ग्लोबल कल्चर के इस प्रभाव का फायदा यह हुआ है कि लोगों को हर तरह का संगीत सुनने का मौका मिला है। बॉलिवुड के म्यूजिक में तो बदलाव आया ही है, साथ ही क्लासिकल म्यूजिक भी प्रभावित हुआ है। समय के साथ बदलाव आते ही हैं। गीतकार और आटिर्स्ट के लिए यह क्रिएटिव चेंज है। इसके सही या गलत का फैसला करना ठीक नहीं है। ट्रेंड क्या है, क्या चल रहा है, उसका कोई लॉजिक या फॉर्म्युला नहीं है। फिर भी लोग इसे पसंद कर ही रहे हैं, उनकी सीडी खरीद रहे हैं। सभी आर्टिस्ट अपना बेस्ट आउटपुट देना चाहते हैं, कोई भी जान बूझकर खराब चीज नहीं बनाएगा।

Source: NBT

नवम्बर 14, 2007

उस्ताद गुलाम अली लाइव इन कंसर्ट, सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम, दिल्ली

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उस्ताद गुलाम अली लाइव इन कंसर्ट

स्थान: सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम कॉम्प्लेक्स, अगस्त क्रांति मार्ग, नई दिल्ली
समय: 6:30 PM
फ़ोन: 011-32640810, 9968150101, 9212572703

नवम्बर 13, 2007

..कौन कहता है ¨रदों को खुदा याद नहीं’

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कोटा. गजल सम्राट गुलाम अली का जादू उनके प्रशंसकों के सिर चढ़कर बोलने लगा है। 26 बरस पहले कोटा आए गुलाम अली को सुन चुके उनके प्रशंसकों ने उस gulam aliजमाने की यादों को सहेजना भी शुरू कर दिया है। उनके प्रशंसक कहते हैं कि गुलाम अली को कोटा लाने में प्रसिद्ध कव्वाल युसूफ अली माध्यम बने थे।

गुलाम अली के प्रशंसक तरूमीत सिंह बेदी बताते हैं कि वह 18 जनवरी 1981 की सर्द रात थी, जिसे गुलाम अली की आवाज ने एक यादगार रात बना दिया। बेदी कहते हैं कि गुलाम अली ऐसे गायक हैं जिन्हें कानों से नहीं दिल से सुना जाता है। गुलाम अली के प्रशंसकों में शामिल तत्कालीन विद्युत मंडल में मुख्य अभियंता बीएस झा, डीसीएम के सीएमडी एन सी ब्रrा, जगजीत सिंह बेदी, पारस झांझरी, के एल जोहरी समेत बड़ी संख्या में शहर के प्रबुद्ध नागरिक यहां मौजूद थे।

छोटी बहर की गजल गाने के लिए विख्यात गुलाम अली ने कुछ इस तरह शुरुआत की ‘जाम जब पीता हूं, मुंह से कहता हूं बिस्मिल्लाह, कौन कहता है रिंदों को खुदा याद नहीं’ इसके बाद शुरू हुआ फरमाइशों का दौर जो पूरी रात जारी रह। एक से बढ़कर एक गजल पर श्रोता झूमते रहे। श्रीराम कलामंदिर का परिसर तालियों से गूंज उठा जब फरमाइश पर उन्होंने सुनाया कि ‘कौन समझाए कि क्या रंग है मयखाने का, आंख साकी की उठे नाम हो पैमाने का’। ऐसी ही गजलों को सुनने का एक बार फिर मौका मिलेगा श्रोताओं को 28 अक्टूबर को।

दशहरा मैदान स्थित विजयश्री रंगमंच पर गुलाम अली की गजल संध्या के कार्यक्रम को लेकर व्यापक उत्साह का माहौल है।

प्रोफाइल
* पाकिस्तान के स्यालकोट केलके में 1940 में गुलाम अली का जन्म हुआ।
* पिता गजल गायक व सारंगी वादक थे।गुलाम अली ने 15 बरस की उम्र में गायन सीखना शुरू किया।
* बड़े गुलाम अली से प्रभावित उनके पिता ने नाम ही गुलाम रख दिया।
* 1960 में सबसे पहले लाहौर रेडियो स्टेशन से गजल गायकी की शुरुआत।